Chapter 19
जननायक कर्पूरी ठाकुर
पाठ से
प्रश्न 1.कर्पूरी ठाकुर अपने परिजनों को प्रतीक्षा करने के लिए क्यों कहते
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर अपने परिजनों से इसलिए प्रतीक्षा करने को कहते थे क्योंकि उनके लिए परिवार का सुख व्यक्तिगत लाभ से ऊपर था। वे समझते थे कि असली सेवा और जिम्मेदारी देश की जनता के प्रति है। उनके दृष्टिकोण में देशवासियों की स्वतंत्रता और सम्मानजनक जीवन की प्राप्ति पहले प्राथमिकता है। इसलिए उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक देश के प्रत्येक नागरिक को समान अवसर और सुविधासम्पन्न जीवन नहीं मिलेगा, तब तक परिवार को उनके व्यक्तिगत सुख और आराम की प्रतीक्षा करनी होगी। यह उनके निस्वार्थ देशभक्ति और समाज के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
प्रश्न 2.मैट्रिक के बाद उच्च शिक्षा के लिए उन्हें कहाँ और किस प्रकार जाना पड़ता था ?
उत्तर:मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद कर्पूरी ठाकुर को उच्च शिक्षा के लिए दरभंगा स्थित चंद्रधारी मिथिला कॉलेज में दाखिला लेना पड़ा। आर्थिक तंगी और परिवहन की कठिनाइयों के बावजूद वे नियमित रूप से कॉलेज पहुँचना सुनिश्चित करते थे। इसके लिए उन्हें घर से पैदल चलकर मुक्तापुर रेलवे स्टेशन तक पहुँचना पड़ता था, वहाँ से ट्रेन पकड़कर 50-60 किलोमीटर की दूरी तय कर दरभंगा पहुँचना और फिर दिनभर पढ़ाई के बाद लौटना पड़ता था। यह कठिन यात्रा उनके साहस, लगन और पढ़ाई के प्रति निष्ठा का प्रमाण है।
प्रश्न 3.कर्पूरी ठाकुर को कौन-कौन कार्य करने में आनन्द मिलता था ?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर को अपने बाल्यकाल में चरवाही करना बहुत भाता था, यानी गाय-भैंस चराने में उन्हें आनंद मिलता था। इसके साथ ही वे गाँव की मंडली में बैठकर ग्रामीण गीत गाना और डफली बजाना पसंद करते थे। इसके अलावा, वे पीड़ित और असहाय लोगों की सेवा में भी खुशी महसूस करते थे। इन गतिविधियों से उनका नैतिक और सामाजिक संवेदनशीलता विकसित हुई, जो उनके भविष्य के जनसेवी व्यक्तित्व का आधार बनी।
प्रश्न 4.सचिवालय स्थित कार्यालय में पहले दिन उन्होंने कैसा दृश्य देखा तथा उस पर उन्होंने क्या निर्णय लिया?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर जब अपने सचिवालय स्थित कार्यालय में पहले दिन पहुँचे, तो उन्होंने लिफ्ट पर अंग्रेज़ी में लिखा हुआ वाक्य देखा—“Only for Officers”। इसका अर्थ था कि केवल राजपत्रित अधिकारी ही लिफ्ट का प्रयोग कर सकते हैं, जबकि अन्य कर्मचारियों को सीढ़ियों से ही आना-जाना पड़ता था। इस दृश्य ने उन्हें सामाजिक और प्रशासनिक असमानता की गहरी अनुभूति कराई। उन्होंने तत्काल निर्णय लिया कि यह सामंती प्रथा समाप्त की जानी चाहिए। कर्पूरी जी ने लिफ्ट का प्रयोग अब सभी कर्मचारियों और सचिवालय में आने-जाने वाले आम लोगों के लिए समान रूप से खोल दिया। इस कदम से उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था में समानता और जनहित की मिसाल कायम की।
1. कर्पूरी ठाकुर अपने परिजनों को प्रतीक्षा करने के लिए क्यों कहते थे?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर अपने परिजनों को प्रतीक्षा करने के लिए इसलिए कहते थे क्योंकि उनके लिए देश और समाज की भलाई व्यक्तिगत सुख-सुविधा से पहले आती थी। वे मानते थे कि देशवासियों को स्वतंत्र और सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिए। जब तक यह लक्ष्य पूरा नहीं होता, तब तक उनके परिवार के सुख और आराम की अपेक्षा प्रतीक्षा कर सकते हैं। यह उनके कर्तव्यपरायण दृष्टिकोण, उच्च नैतिकता और जनसेवा के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
2. कर्पूरी ठाकुर का जन्म, परिवार और प्रारंभिक जीवन कैसा था?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1921 को समस्तीपुर जिले के पिताझिया गाँव में हुआ। उनके पिता का नाम गोकुल ठाकुर और माता का नाम रामदुलारी देवी था। प्रारंभिक जीवन अत्यंत साधारण और गरीब परिस्थितियों में बीता। बचपन में वे खेल-कूद, गाय-भैंस चराने और गाँव के लोकगीतों में भाग लेने में रत रहते थे। दौड़ने और तैरने का शौक भी था। उनके इस सरल और कठिन जीवन में भी उत्साह, लगन और सामाजिक संवेदनाएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती थीं।
3. कर्पूरी ठाकुर के बाल्यकाल की खासियत क्या थी?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर का बाल्यकाल साधारण और मेहनतपूर्ण था। वे सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं थे, बल्कि खेल-कूद, दौड़ और तैराकी में भी सक्रिय रहते थे। साथ ही, गाँव के पशुओं को चराना और लोकगीतों में भाग लेना उनके जीवन का हिस्सा था। मंडली में डफ बजाना और अन्य बच्चों के साथ सामूहिक गतिविधियों में अग्रणी भूमिका निभाना उनके भीतर जन्मजात नेतृत्व क्षमता और संगठनात्मक कौशल को दर्शाता है। इन अनुभवों ने उनके सामाजिक और नैतिक दृष्टिकोण को भी संवारने में मदद की।
4. उन्होंने शिक्षा के लिए किन कठिनाइयों का सामना किया?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर ने अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए बहुत कठिनाइयों का सामना किया। उनके पास आर्थिक साधन इतने कम थे कि छात्रावास में रहना संभव नहीं था। इसलिए वे प्रतिदिन 50-60 किलोमीटर की दूरी पैदल और रेल मार्ग से तय करते थे। बिना जूते-चप्पल, केवल धोती और गमछा लेकर कॉलेज पहुँचते और दिनभर पढ़ाई करते। इस दौरान शारीरिक श्रम और मानसिक संघर्ष के बावजूद उन्होंने अपने अध्ययन को कभी प्राथमिकता से पीछे नहीं हटने दिया। यह उनके अडिग संकल्प, धैर्य और शिक्षा के प्रति गहरी प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
5. कर्पूरी ठाकुर ने किस वर्ष मैट्रिक की परीक्षा पास की और किस श्रेणी में?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर ने सन् 1940 ई० में मैट्रिक परीक्षा पास की और इसे द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण किया। यह सफलता कठिन परिश्रम, लगन और संघर्ष का परिणाम थी। उन्होंने लंबी दूरी की पैदल यात्रा, शारीरिक श्रम और आर्थिक कठिनाइयों के बीच भी पढ़ाई जारी रखी। इस उपलब्धि से उनके धैर्य, साहस और शिक्षा के प्रति गहन प्रतिबद्धता का परिचय मिलता है।
6. सन् 1942 की अगस्त क्रांति में कर्पूरी ठाकुर की भूमिका क्या थी?
उत्तर:सन् 1942 की अगस्त क्रांति के समय कर्पूरी ठाकुर ने अपनी पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्होंने दरभंगा जिले में कैदियों को संगठित किया और छात्रों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ बहिष्कार में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। उनकी इस सक्रिय भूमिका के कारण उन्हें गिरफ्तार कर भागलपुर कैम्प जेल में स्थानांतरित किया गया। इस घटना से उनके साहस, देशभक्ति और नेतृत्व क्षमता का स्पष्ट प्रमाण मिलता है, और यह दिखाता है कि वे व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर समाज और देश की भलाई के लिए समर्पित थे।
7. जेल में कर्पूरी ठाकुर ने क्या कदम उठाए?
उत्तर:भागलपुर कैम्प जेल में कैदियों की सुविधा और अधिकारों के लिए कर्पूरी ठाकुर ने 25 दिनों का उपवास रखा। इस साहसिक और अनुशासित कदम के कारण प्रशासन को झुकना पड़ा और कैदियों की मांगें पूरी की गईं। इस घटना से उनके संघर्षशील स्वभाव, न्यायप्रिय दृष्टिकोण और जनसेवा के प्रति गहरे समर्पण का परिचय मिलता है। यह दर्शाता है कि वे केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज और कमजोर वर्गों के लिए भी लड़ने को तैयार थे।
8. कर्पूरी ठाकुर की शिक्षा और संघर्ष में क्या समानता है?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर की शिक्षा और उनके संघर्ष में गहरी समानता यह है कि दोनों ही उनके दृढ़ निश्चय, धैर्य और समाज सेवा की भावना को उजागर करते हैं। कठिन आर्थिक हालात और सामाजिक बाधाओं के बावजूद उन्होंने पढ़ाई पूरी की और देश की आज़ादी के लिए सक्रिय रूप से संघर्ष किया। यह दर्शाता है कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत उन्नति का माध्यम नहीं, बल्कि साहस और नैतिक मूल्यों के साथ जुड़कर समाज सुधार का साधन बन सकती है।
9. सचिवालय स्थित कार्यालय में उन्होंने क्या देखा और क्या निर्णय लिया?
उत्तर:जब कर्पूरी ठाकुर पहली बार सचिवालय स्थित अपने कार्यालय पहुँचे, तो उन्होंने लिफ्ट पर अंग्रेज़ी में लिखा वाक्य देखा – “only for officers”, जिसका मतलब था कि केवल राजपत्रित अधिकारी ही लिफ्ट का इस्तेमाल कर सकते थे और अन्य कर्मचारी सीढ़ियों से ही ऊपर-नीचे आते थे। कर्पूरी ठाकुर ने इसे असमान और अन्यायपूर्ण व्यवस्था माना। उन्होंने सरकार के उच्च अधिकारियों के विरोध के बावजूद इस नियम को बदलकर लिफ्ट का प्रयोग सभी कर्मचारियों के लिए समान रूप से संभव करवा दिया। यह कदम उनके न्यायप्रिय, समानतावादी और जनसेवा के दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
10. कर्पूरी ठाकुर का जनसेवा और हृदयस्पर्शी उदाहरण क्या है?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर ने अपने जनसेवा के प्रति समर्पण का अद्भुत उदाहरण तब दिखाया जब एक हैजा पीड़ित व्यक्ति को अस्पताल ले जाने का कोई साधन नहीं था। उन्होंने न केवल उस व्यक्ति को अपने कंधे पर उठाया बल्कि करीब पाँच किलोमीटर पैदल चलकर उसे अस्पताल पहुँचाया। इस घटना से उनके साहस, करुणा और समाज के प्रति गहरे लगाव का पता चलता है। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि वे अपने अधिकार और पद केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज और जरूरतमंद लोगों की भलाई के लिए इस्तेमाल करते थे।
11. कर्पूरी ठाकुर ने कितने वर्षों तक विधानसभा सदस्य के रूप में सेवा की?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर ने सन् 1952 से 1988 तक लगातार बिहार विधानसभा के सदस्य के रूप में सेवा दी, यानी कुल 36 वर्षों तक। इस लंबी अवधि में उन्होंने लगातार जनता की भलाई, राज्य की समस्याओं का समाधान और समाज में न्याय एवं समानता को बढ़ावा देने का कार्य किया। यह उनके जनसेवा के प्रति अटूट समर्पण और स्थायी नेतृत्व क्षमता का परिचायक है।
12. कर्पूरी ठाकुर ने कौन-कौन से पदों पर कार्य किया?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर ने अपने राजनीतिक जीवन में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वे बिहार विधानसभा के कार्यवाहक अध्यक्ष, विपक्षी दल के नेता, उपमुख्यमंत्री और दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे। इन पदों पर रहते हुए उन्होंने न केवल प्रशासनिक और राजनीतिक जिम्मेदारियाँ निभाईं, बल्कि समाज में सुधार, समानता और जनकल्याण के लिए ठोस कदम उठाए। यह उनके नेतृत्व कौशल, दूरदर्शिता और जनसेवा के प्रति गहरी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है।
13. कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व की विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व की विशेषताएँ अत्यंत प्रेरक और आदर्शपूर्ण थीं। वे न्यायप्रिय और निष्पक्ष थे, गरीबों और आम जनता के प्रति गहरी संवेदनशीलता रखते थे। उनका साहस और दृढ़ निश्चय उन्हें किसी भी कठिन परिस्थिति में मजबूत बनाता था। उन्होंने हर निर्णय में व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर समाज और जनता के हित को प्राथमिकता दी। उनके नेतृत्व में समानता, जनसेवा और नैतिक मूल्यों की स्पष्ट झलक मिलती थी, जो उन्हें जनप्रिय और आदर्श नेता बनाती थी।
14. उनके संघर्ष और जेल यात्रा का समाज पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर की जेल यात्रा और उनके संघर्ष ने समाज पर गहरा प्रभाव डाला। यह दिखाया कि अन्याय और उत्पीड़न के खिलाफ साहसपूर्वक खड़ा होना और अपने अधिकारों के लिए लड़ना न केवल संभव है, बल्कि आवश्यक भी है। उनके दृढ़ संकल्प और त्याग ने आम लोगों में जागरूकता और साहस पैदा किया। इससे समाज के अन्य लोग भी राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों में सक्रिय हुए और समानता, न्याय तथा जनहित के लिए प्रयास करने लगे। उनके संघर्ष ने समाज में एक सकारात्मक बदलाव की लहर पैदा की।
15. कर्पूरी ठाकुर का बाल्यकाल उनके व्यक्तित्व पर कैसे प्रभाव डालता है?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर का बाल्यकाल साधारण और मेहनतपूर्ण था। खेल-कूद में सक्रिय रहना, गाय और अन्य पशुओं को चराना तथा गाँव की मंडली में गीत और डफली बजाना उनके व्यक्तित्व में अनुशासन, नेतृत्व क्षमता और सामाजिक सहभागिता की भावना को विकसित करने वाला अनुभव था। इन अनुभवों ने उन्हें न केवल दृढ़ निश्चयी और साहसी बनाया, बल्कि भविष्य में न्यायप्रिय, संवेदनशील और जनसेवा के प्रति समर्पित नेता बनने की नींव भी रखी। उनका बाल्यकाल उनके व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
16. उन्होंने शिक्षा और समाज सेवा को किस तरह संतुलित किया?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर ने अपने जीवन में शिक्षा और समाज सेवा का अद्भुत संतुलन स्थापित किया। दिन के समय वे विद्यालय में पढ़ाई और अध्यापन कार्य में संलग्न रहते थे, जबकि रात में स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभाते थे। यह उनकी अनुशासनप्रिय जीवनशैली, समय का प्रभावी प्रबंधन और कर्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पण को दर्शाता है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत शिक्षा और समाज की भलाई के लिए किए जाने वाले कार्य आपस में विरोधी नहीं, बल्कि सहायक हो सकते हैं, और सही दृष्टिकोण और दृढ़ निश्चय से दोनों को संतुलित किया जा सकता है।
17. कर्पूरी ठाकुर के जीवन में आर्थिक कठिनाइयों का क्या स्थान था?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर के जीवन में आर्थिक कठिनाइयाँ एक बड़ी चुनौती थीं, लेकिन उन्होंने इन्हें कभी अपने मार्ग में रोड़ा नहीं बनने दिया। छात्रावास की सुविधा न होने के कारण उन्हें हर दिन 50–60 किलोमीटर की दूरी पैदल या रेल द्वारा तय करनी पड़ती थी। सीमित संसाधनों और गरीबी के बावजूद उन्होंने निरंतर पढ़ाई जारी रखी और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहे। यह उनके दृढ़ निश्चय, मेहनत और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है, जो यह साबित करता है कि साहस और लगन किसी भी आर्थिक बाधा को पार कर सकती है।
18. कर्पूरी ठाकुर का सामंती प्रथा के खिलाफ कदम क्या था?
उत्तर:कर्पूरी ठाकुर ने सचिवालय में पहली बार अपने कार्यालय जाने पर देखा कि लिफ्ट पर लिखा था “Only for Officers,” यानी केवल राजपत्रित अधिकारी ही इसका उपयोग कर सकते थे, जबकि अन्य कर्मचारी सीढ़ियों से ही ऊपर-नीचे होते थे। यह स्पष्ट रूप से सामंती प्रथा का प्रतीक था। कर्पूरी ठाकुर ने उच्च अधिकारियों के विरोध के बावजूद यह व्यवस्था बदल दी और लिफ्ट का प्रयोग सभी कर्मचारियों और अन्य उपस्थित लोगों के लिए समान रूप से लागू कर दिया। इस कदम ने उनके न्यायप्रिय दृष्टिकोण, समानता की भावना और समाज में अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता को उजागर किया।
19. कर्पूरी ठाकुर के खेल और शारीरिक परिश्रम का महत्व क्या था?
उत्तर:
बाल्यकाल में दौड़ने और तैरने का शौक उन्हें शारीरिक रूप से मजबूत बनाता था। यह उनकी सहनशीलता, धैर्य और मानसिक दृढ़ता को बढ़ाता था, जो भविष्य में कठिन परिस्थितियों और राजनीतिक संघर्ष में काम आई।
20. कर्पूरी ठाकुर की मृत्यु कब हुई और क्यों?
उत्तर:
कर्पूरी ठाकुर का निधन 17 फरवरी 1988 को हृदयाघात के कारण हुआ। उनके जीवनकाल में उन्होंने लगातार समाज और गरीबों के लिए सेवा की। उनका निधन एक महान जनसेवी और न्यायप्रिय नेता के रूप में हुआ, जिन्होंने बिहार की राजनीति और समाज में स्थायी छाप छोड़ी।
Answer by Mrinmoee