Chapter 21

                                                         चिकित्सा का चक्कर


 

  1. प्रश्न: पाठ में लेखक अपनी बीमारी का वर्णन किस प्रकार करते हैं?
    उत्तर: 
    लेखक अपनी बीमारी को व्यक्तिगत अनुभव और सूक्ष्म निरीक्षण के साथ पेश करते हैं। वे यह बताते हैं कि अब तक गंभीर रूप से कभी बीमार नहीं हुए, लेकिन अचानक हुई बीमारी ने उन्हें अपने स्वास्थ्य और उसके महत्व को महसूस करवा दिया। लेखक बीमारी को केवल शारीरिक पीड़ा के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक दृष्टि से भी अनुभव करते हैं। वे पाठ में हास्य और व्यंग्य का प्रयोग करते हुए बताते हैं कि कैसे परिवार, मित्र और चिकित्सक उनकी स्थिति को गंभीरता से लेते हैं, और इस पूरी प्रक्रिया में उनका अपना दृष्टिकोण, चिंता और मनोवैज्ञानिक अनुभव कैसा रहा।

  2. प्रश्न: लेखक ने अपने बचपन और सामान्य स्वास्थ्य के बारे में क्या बताया?
    उत्तर: 
    लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि उनकी उम्र लगभग पैतीस वर्ष है और अब तक उन्हें गंभीर रूप से किसी बीमारी का सामना नहीं करना पड़ा। वे बताते हैं कि बीमार होने का अनुभव उनके लिए रहस्यमय और रोचक लगता था, क्योंकि तब लोग उनके स्वास्थ्य की विशेष चिंता करते, उन्हें दवा और विशेष देखभाल देते। इस दृष्टि से उनका बचपन और सामान्य स्वास्थ्य पूर्ण रूप से स्वस्थ और सक्रिय रहा, और बीमारी की कल्पना उन्हें उत्सुकता और आनंद का अनुभव कराती थी।

  3. प्रश्न: लेखक को किस बात का आनंद आता था जब वह बीमार होता?
    उत्तर: 
    लेखक इस बात का वर्णन करते हैं कि उन्हें सबसे अधिक आनंद तब मिलता था जब उनके मित्र और परिवारजन गंभीर चेहरों और गंभीर स्वरों में उनकी तबीयत के बारे में पूछते। जैसे कि वे पूछें, "बेढबजी, कैसी तबीयत है? दवा का कोई असर हुआ?" इस गंभीरता और चिंता के बीच लेखक को अद्भुत सुख का अनुभव होता था। उनके लिए यह केवल शारीरिक बीमारी नहीं थी, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक दृष्टि से एक मनोरंजक और सुखद अनुभव बन जाती थी, जिसमें लोग उनकी देखभाल करते और उनका ध्यान रखते थे।

  4. प्रश्न: लेखक ने हॉकी खेल के बाद किस प्रकार की घटना का उल्लेख किया है?
    उत्तर: 
    लेखक बताते हैं कि हॉकी खेलकर आने के बाद उन्होंने खेल के दौरान कुछ अधिक रिफ्रेशमेंट ले लिया था, जिससे सामान्य समय पर भोजन करने की उनकी भूख कम थी। उनकी पत्नी ने उन्हें भोजन करने का आग्रह किया, परंतु लेखक ने विनम्रता से मना कर दिया और कहा कि उन्होंने स्कूल में मिठाई खाई है। इसके बाद ‘प्रसाद’ जी से बारा बाज़ार के रसगुल्ले आए, जिन्हें उन्होंने खाया और फिर चारपाई पर आराम करने के लिए लेट गए। इस वर्णन में लेखक न केवल अपनी भूख और खाने की आदतों का विवरण देते हैं, बल्कि इसे व्यंग्यात्मक और सूक्ष्म शैली में प्रस्तुत कर पाठकों को मनोरंजन भी प्रदान करते हैं।

  5. प्रश्न: लेखक को रात में किस प्रकार का दर्द हुआ और उन्होंने क्या उपाय किया?
    उत्तर: 
    लेखक बताते हैं कि रात के लगभग तीन बजे उन्हें नाभि के नीचे दाहिनी ओर पेट में भयंकर दर्द हुआ, ऐसा प्रतीत होता था मानो बड़ी-बड़ी सूइयाँ पेट में घुस रही हों। भय के बजाय लेखक ने अपने पास रखी हुई औषधियों का सहारा लिया और तुरंत दवा की कुछ बूँदें पान की। इसके बाद भी दर्द में कोई विशेष राहत नहीं मिली। यह विवरण लेखक की स्व-उपचार की आदत, औषधियों पर भरोसा और दर्द को सहन करने की क्षमता को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करता है।

  6. प्रश्न: डॉक्टर साहब के आगमन का वर्णन कैसे किया गया है?
    उत्तर: 
    लेखक बताते हैं कि डॉक्टर साहब सरकारी अस्पताल से आए और उनकी पोशाक इतनी भव्य और औपचारिक थी कि ऐसा प्रतीत होता था मानो वे किसी राजसी समारोह में उपस्थित हों। उनका व्यक्तित्व गंभीर, आत्मविश्वासी और पेशेवर था। लेखक ने इस आगमन का विवरण व्यंग्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है, जिसमें डॉक्टर की पोशाक, मुस्कान और रोगी के प्रति उनके व्यवहार का हास्यपूर्ण और सूक्ष्म चित्रण किया गया है।

  7. प्रश्न: डॉक्टर साहब ने लेखक को क्या सलाह दी और किस प्रकार दवा दी गई?

  8. उत्तर: डॉक्टर साहब ने लेखक को निर्देश दिया कि थोड़ी गरम पानी के साथ दवा लें, और तुरंत ही एक छोटी पिचकारी में लंबी सूई लगाकर दवा लेखक के पेट में डाली। इसके तुरंत बाद लेखक को नींद आ गई और अगले दिन सुबह तक दर्द में स्पष्ट कमी देखने को मिली। इस घटना के माध्यम से लेखक ने डॉक्टर की व्यावहारिक चिकित्सा पद्धति, उनकी दक्षता और उपचार के तुरंत प्रभाव को व्यंग्यात्मक और सूक्ष्म शैली में प्रस्तुत किया है।

  9. प्रश्न: लेखक ने डॉक्टर चूहानाथ कातरजी का उल्लेख क्यों किया है?
    उत्तर:
    लेखक बताते हैं कि जब उनके लगातार बने रहने वाले दर्द में पहले डॉक्टरों की दवाइयाँ कोई खास राहत नहीं दे पाईं, तब डॉक्टर चूहानाथ कातरजी को बुलाया गया। लेखक ने उन्हें व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत करते हुए उनकी विशेषज्ञता, दवाओं की प्रभावशीलता, और फीस का विवरण विस्तार से बताया है। इसके माध्यम से पाठ में विभिन्न चिकित्सकों के व्यवहार, उनके उपचार के तरीके और लेखक के व्यक्तिगत अनुभव का रोचक और हृदयस्पर्शी चित्रण देखने को मिलता है।

  10. प्रश्न: डॉक्टर चूहानाथ की दवा का प्रभाव लेखक पर कैसा पड़ा?
    उत्तर: 
    लेखक बताते हैं कि डॉक्टर चूहानाथ कातरजी की दवा लेने के बावजूद शुरुआत में उनके दर्द में पूर्ण राहत नहीं मिली, लेकिन धीरे-धीरे दर्द में कमी महसूस होने लगी। लेखक ने दवा के स्वाद, शीशी की मात्रा और उसकी प्राप्ति के अनुभव का विस्तृत और व्यंग्यपूर्ण वर्णन किया है। इस घटना के माध्यम से लेखक ने चिकित्सकीय प्रक्रियाओं, औषधियों की कार्यप्रणाली और अपने अनुभव को हास्य और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया है।

  11. प्रश्न: लेखक ने वैद्य और हकीम के उपचार के बारे में क्या उल्लेख किया है?
    उत्तर: 
    लेखक बताते हैं कि वैद्य और हकीम अपने-अपने पारंपरिक तरीके से उनका उपचार करने आए। वैद्यजी ने आयुर्वेदिक पद्धति अपनाते हुए श्लोक पढ़कर दवा दी और शरीर में दोषों का विवरण प्रस्तुत किया, जबकि हकीमजी हकीमी औषधियों और विशेष पोशाक के साथ आए। लेखक ने उनके व्यक्तित्व, पोशाक, शारीरिक बनावट और उपचार शैली का व्यंग्यात्मक और सूक्ष्म वर्णन किया है, जिससे पाठक को दोनों चिकित्सकीय पद्धतियों और लेखक के हास्यपूर्ण दृष्टिकोण का स्पष्ट अनुभव होता है।

  12. प्रश्न: वैद्यजी ने रोग का निदान किस प्रकार किया?
    उत्तर: 
    लेखक बताते हैं कि वैद्यजी ने पहले उनकी नाड़ी देखकर और हाथ-पाँव की जाँच करके रोग का निदान किया। उन्होंने बताया कि वायु का प्रकोप यकृत और पित्ताशय में पहुँच गया है, जिससे लेखक को मंदाग्नि और पेट में दर्द हो रहा है। इसके बाद वैद्यजी ने उपचार और औषधि देने की प्रक्रिया आरंभ की। लेखक ने इस पूरी प्रक्रिया का व्यंग्यात्मक और विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, जिसमें वैद्यजी की गंभीरता और औषधियों के पारंपरिक प्रयोग का रोचक चित्रण शामिल है।

  13. प्रश्न: हकीम साहब की पोशाक का वर्णन कैसे किया गया है?
    उत्तर: 
    लेखक बताते हैं कि हकीम साहब चिकन का बंददार कुरता, बनारसी टोपी और पाजामा पहने हुए थे, जिनसे उनका व्यक्तित्व और पोशाक दोनों हास्यस्पद लगते थे। लेखक का यह व्यंग्यपूर्ण विवरण दर्शाता है कि हकीम साहब इतने दुबले-पतले थे कि ऐसा लगता था जैसे अपनी तंदुरूस्ती वे अपने मरीजों में बाँट रहे हैं। उनके रहन-सहन, पोशाक और फैशन का वर्णन पाठ में हास्य और व्यंग्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है, जिससे हकीम साहब का व्यक्तित्व जीवंत और मनोरंजक प्रतीत होता है।

  14. प्रश्न: पाठ में दवा की प्रक्रिया और प्रभाव का वर्णन कैसे किया गया है?
    उत्तर: 
    लेखक ने व्यंग्यात्मक और सूक्ष्म दृष्टिकोण से बताया है कि उन्हें पिचकारी के माध्यम से दवा दी गई, शीशी प्राप्त हुई, और गरम बोतल से सेंकाई की गई। इस दौरान उन्हें दवा का स्वाद और औषधियों की लंबी प्रक्रिया का अनुभव भी हुआ। दर्द में कुछ हद तक कमी आई, पर पूरी राहत नहीं मिली। लेखक ने दवा की अनुपस्थिति, प्रभाव और औषधि लेने की लगातार होने वाली घटनाओं का विस्तारपूर्वक और हास्यपूर्ण ढंग से वर्णन किया है, जिससे पाठ में चिकित्सा प्रक्रिया का रोचक और जीवंत चित्र उभरकर आता है।

  15. प्रश्न: लेखक ने चिकित्सकीय अनुभवों को व्यंग्यात्मक क्यों प्रस्तुत किया?
    उत्तर: 
    लेखक ने अपने अनुभवों में आने वाले चिकित्सकों, दवाओं और परिवार की प्रतिक्रियाओं को व्यंग्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है ताकि पाठक चिकित्सा पद्धतियों और समाज में बीमारी के प्रति लोगों की प्रतिक्रियाओं का हास्यपूर्ण और आलोचनात्मक दृष्टिकोण समझ सकें। इस शैली के माध्यम से लेखक पाठकों को न केवल मनोरंजन प्रदान करता है, बल्कि उन्हें सोचने और चिकित्सा तथा सामाजिक व्यवहार पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करता है।

  16. प्रश्न: पाठ में लेखक की पीड़ा और हास्य का संतुलन कैसे दिखाई देता है?
    उत्तर: 
    लेखक ने अपने शारीरिक दर्द, असुविधाओं और बीमार होने के अनुभव को विस्तारपूर्वक बताते हुए, चिकित्सकों की विचित्र पोशाक, अजीब व्यवहार और परिवारजन की प्रतिक्रियाओं का व्यंग्यपूर्ण और हास्यपूर्ण चित्रण किया है। इस तरह गंभीर पीड़ा और हास्य दोनों को संतुलित रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे पाठक केवल लेखक की तकलीफ नहीं देखता, बल्कि चिकित्सकीय प्रक्रिया और सामाजिक व्यवहार के हास्यपूर्ण पहलुओं का भी आनंद लेता है।

  17. प्रश्न: लेखक ने अपने परिवार के लोगों का चिकित्सीय प्रक्रिया में योगदान कैसे दिखाया?
    उत्तर: 
    लेखक ने अपने परिवार के सदस्यों, विशेषकर पत्नी और नानी, की सक्रिय भागीदारी का उल्लेख किया है। वे चिकित्सकों के आने, दवाइयों के उपयोग और उपचार के तरीके पर अपनी राय देते, सुझाव देते और कभी-कभी लेखक को आश्वस्त या नियंत्रित भी करते हैं। इस तरह परिवार का योगदान लेखक के अनुभव को और अधिक व्यंग्यपूर्ण और जीवंत बनाता है, क्योंकि उनके हस्तक्षेप और प्रतिक्रियाएँ पाठक को हँसी और सोचने का अवसर दोनों प्रदान करती हैं।

  18. प्रश्न: लेखक के अनुसार औषधियों का स्वाद और प्रभाव कैसा था?
    उत्तर: 
    लेखक बताते हैं कि उन्हें दी गई औषधियाँ स्वाद में अत्यंत अप्रिय थीं, ऐसा लगता था मानो मुर्दे के मुख में डाली जाएँ। इसके बावजूद इन दवाइयों का चिकित्सीय प्रभाव नजर आने लगा और धीरे-धीरे उनके दर्द में राहत मिलने लगी। लेखक इस अनुभव को व्यंग्यपूर्ण और हास्यपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करते हैं, जिससे औषधियों की अप्रियता और उनके प्रभाव के बीच की विरोधाभासी स्थिति पाठक के समक्ष जीवंत रूप में आती है।

  19. प्रश्न: पाठ में डॉक्टरों की फीस और आर्थिक पहलू का वर्णन क्यों किया गया है?
    उत्तर: 
    लेखक व्यंग्यपूर्ण शैली में बताते हैं कि डॉक्टरों की फीस अक्सर अचानक बढ़ जाती थी और औषधियों की लागत उनके लिए चिंता का कारण बन गई थी। उन्होंने यह स्थिति हास्यपूर्वक प्रस्तुत की है, जिससे पाठक डॉक्टरों की चिकित्सा प्रक्रिया के साथ-साथ आर्थिक बोझ और उससे उत्पन्न हल्के व्यंग्य का अनुभव कर सके। इस प्रकार पाठ में चिकित्सा और धन दोनों का मिश्रण पाठ को रोचक और मनोरंजक बनाता है।

  20. प्रश्न: लेखक ने किस प्रकार डॉक्टर की विशेषज्ञता का उल्लेख किया है? 
  21.  उत्तर: लेखक व्यंग्य और विवरणात्मक शैली में बताते हैं कि डॉक्टर चूहानाथ कातरजी लंदन से FRCS थे, जो उनके उच्च पेशेवर स्तर और विशेषज्ञता का प्रमाण है। उनकी विशेषज्ञता और अनुभव के कारण ही औषधियों का सही असर दिखाई दिया। लेखक इस तथ्य का उल्लेख कर पाठकों को डॉक्टर की प्रतिष्ठा, पेशेवर दक्षता और उपचार की विश्वसनीयता का अनुभव कराते हैं, साथ ही इस स्थिति को हास्य और व्यंग्य के माध्यम से रोचक ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

21. प्रश्न: लेखक के अनुसार दवा और चिकित्सक के व्यवहार का मानसिक प्रभाव क्या था?
उत्तर: 
लेखक बताते हैं कि दवा लेने के साथ-साथ चिकित्सक का मुस्कुराना, आश्वासन देना और हास्यपूर्ण बातें करना उन्हें मानसिक रूप से संतोष और राहत प्रदान करता था। यह अनुभव केवल शारीरिक उपचार तक सीमित नहीं था, बल्कि लेखक के मानसिक और भावनात्मक स्थिति पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता था। पाठ में यह दिखाया गया है कि चिकित्सक का व्यवहार और दवा दोनों मिलकर रोगी के मनोबल और मानसिक संतोष को प्रभावित करते हैं।

22. प्रश्न: लेखक ने पारंपरिक चिकित्सा के प्रति क्या दृष्टिकोण रखा?
उत्तर: 
लेखक बताते हैं कि उन्होंने पारंपरिक चिकित्सा का अनुभव किया और देखा कि इसमें जटिल उपचार पद्धतियाँ, शास्त्रीय श्लोक और रहस्यपूर्ण उपाय शामिल थे। इसके बावजूद वे इसे पूरी गंभीरता से अपनाते हुए स्वास्थ्य लाभ पाने का प्रयास करते रहे। पाठ में लेखक इस प्रक्रिया का व्यंग्यपूर्ण और सूक्ष्म चित्रण करते हुए यह दिखाते हैं कि पारंपरिक चिकित्सा में हास्य और गंभीरता दोनों मौजूद हैं, और रोगी के दृष्टिकोण से यह अनुभव कभी-कभी मनोरंजक और कभी-कभी चुनौतीपूर्ण होता है।

23. प्रश्न: लेखक के अनुभव में बीमारी और मित्रों की प्रतिक्रिया का क्या महत्व था?
उत्तर: 
लेखक बताते हैं कि बीमारी के समय उनके मित्र और परिवारजन गंभीर मुद्रा अपनाकर स्वास्थ्य के बारे में पूछते और सलाह देते थे। यह व्यवहार लेखक के लिए न केवल मनोरंजन का साधन था, बल्कि मानसिक संतोष और आत्ममूल्यांकन का अवसर भी प्रदान करता था। मित्रों और परिवार की प्रतिक्रियाएँ लेखक के अनुभव को रोचक और व्यंग्यपूर्ण बनाती थीं, जिससे पाठ में हास्य और सामाजिक संदर्भ दोनों का संतुलन दिखाई देता है।

पाठ से

प्रश्न 1. लेखक को बीमार पड़ने की इच्छा क्यों हुई?

उत्तर:- लेखक बताते हैं कि उन्हें बीमार होने की इच्छा इसलिए हुई क्योंकि उस स्थिति में वे विशेष देखभाल और ध्यान का अनुभव कर सकते थे। बीमार होने पर उन्हें घरवालों से प्यार और सहयोग मिलता, बिस्किट और औषधियाँ आसानी से मिलतीं, और मित्र गंभीर मुद्रा में उनकी तबीयत पूछते। इस प्रकार लेखक के लिए बीमारी केवल शारीरिक अस्वस्थता नहीं, बल्कि एक सामाजिक और भावनात्मक अनुभव बन जाती थी, जिसमें वे दूसरों के स्नेह और चिंता का केंद्र बन जाते थे।

प्रश्न 2. लेखक ने बैद्य और हकीम पर क्या-क्या कहकर व्यंग्य किया है ? उनमें से सबसे तीखा क्या था ?

उत्तर:- लेखक ने बैद्य और हकीम दोनों पर व्यंग्य करते हुए उनके शारीरिक रूप, पोशाक और व्यवहार का हास्यपूर्ण विवरण प्रस्तुत किया है। बैद्यजी के बारे में लेखक बताते हैं कि वे पालकी पर तशरीफ़ लाते हैं, धोती और जनेऊ पहनते हैं, और ऐसा लगता है जैसे अभी कुश्ती लड़कर आए हों। उनकी गंभीर मुद्रा और श्लोक सुनाने की प्रक्रिया भी लेखक के लिए व्यंग्य का विषय बनती है। वहीं हकीम साहब की पोशाक, चिकन का बंददार कुरता, बनारसी टोपी और दुबली-पतली देह का वर्णन हास्यपूर्ण ढंग से किया गया है। सबसे तीखा व्यंग्य बैद्यजी के बारे में था, जहां उनके गंभीर और विचित्र व्यवहार, पोशाक और उपचार की लंबी प्रक्रियाओं को अत्यंत मज़ाकिया और हास्यपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया गया है।

प्रश्न 3. अपने देश में चिकित्सा की कितनी पद्धतियाँ प्रचलित हैं। उनमें से किन-किन पद्धतियों से लेखक ने अपनी चिकित्सा कराई।

उत्तर:- हमारे देश में चिकित्सा के कई प्रकार प्रचलित हैं, जिनमें प्रमुख हैं – एलोपैथिक, आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक, यूनानी, प्राकृतिक चिकित्सा, जल चिकित्सा और तंत्र-मंत्र चिकित्सा। लेखक ने अपने अनुभव में इन पद्धतियों में से एलोपैथिक पद्धति के तहत डॉक्टर चूहानाथ कातरजी और अन्य एलोपैथिक चिकित्सकों से दवा और उपचार कराया। इसके साथ ही उन्होंने आयुर्वेदिक पद्धति के वैद्यजी से भी उपचार लिया, जिन्होंने नाड़ी देखकर और शारीरिक परीक्षण करके औषधियाँ दीं। इसके अलावा लेखक हकीम साहब से यूनानी पद्धति के अनुसार दवा और उपचार भी कराते रहे। इस प्रकार पाठ में लेखक ने देश की विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों का अनुभव किया और उनके हास्यपूर्ण और व्यंग्यात्मक चित्रण के माध्यम से पाठक को चिकित्सकीय दुनिया की विविधता से परिचित कराया।

प्रश्न 4. इस पाठ में हास्य-व्यंग्य की बातें छाँटकर लिखिए । जैसे-रसगुल्ले छायावादी कविताओं की भाँति सूक्ष्म नहीं थे स्थूल थे।

उत्तर:- इस पाठ में निम्न हास्य-व्यंग्य की बातें हैं:-

  • डॉक्टर का सूट पहनने का ढंग (प्रिंस ऑफ वेल्स के वैलेट जैसा)
  • डॉक्टर का इक्के पर आना (नेताओं की तरह)
  • जीभ देखने पर संकेत
  • दर्शकों द्वारा नुक्सों का बताना
  • रात में डॉक्टर की फीस बढ़ना
  • डॉक्टर बुलाने पर होने वाली बहस
  • बैद्यों के मैले जनेऊ (कुश्ती लड़कर आए जैसे)
  • हकीम के पैजामे का वर्णन
  • हकीम के यश की प्रशंसा

प्रश्न 5. किसने कहा, किससे कहा?

(क) मुझे आज सिनेमा जाना है। तुम अभी खा लेते तो अच्छा था।

उत्तर:- लेखक की पत्नी ने लेखक से कहा।

(ख) घबराने की कोई बात नहीं है दवा पीजिए दो खुराक पीते-पीते आपका दर्द गायब हो जायेगा।

उत्तर:- सरकारी डॉक्टर ने लेखक से कहा।

(ग) वाय का प्रकोप है। यकृत में वाय घमकर पित्ताशय में प्रवेश कर आंत्र में जा पहुँचा है।

उत्तर:- आयुर्वेदिक डॉक्टर ने लेखक से कहा।

(घ) दो खुराक पीते-पीते आपका दर्द वैसे ही गायब हो जायेगा, जैसे-हिंदुस्तान से सोना गायब हो रहा है।” इस वाक्य का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:- इस वाक्य का आशय है कि जिस प्रकार भारत से सोना धीरे-धीरे गायब हो रहा है, उसी तरह आपका दर्द भी इस दवा के सेवन से धीरे-धीरे दूर होता जाएगा। यहां हकीम साहब ने हिंदुस्तान से सोने के गायब होने की उपमा देकर आपके दर्द के धीरे-धीरे दूर होने की बात कही है।


Answer by Mrinmoee