Chapter 3
اردو زبان
1. प्रश्न: اردو زبان का آغاز कब और किस कारण से हुआ?
उत्तर:اردو زبان کی ابتدا उस समय हुई जब भारत में मुसलमान आए और अपने साथ फारसी और अरबी जैसी भाषाएँ लेकर आए। भारत के विभिन्न क्षेत्रों की बोलियाँ और स्थानीय भाषाएँ इस समय उनके संपर्क में आईं। इस सांस्कृतिक और भाषाई मेलजोल के कारण समय के साथ एक नई भाषा का निर्माण हुआ। प्रारंभ में मुसलमान केवल फारसी बोलते थे और यह भाषा प्रशासन और सेना तक सीमित थी, लेकिन स्थानीय भाषा और बोलियों के प्रभाव से इसमें नए शब्द, उच्चारण और व्याकरणिक परिवर्तन आए। धीरे-धीरे यह मिश्रित भाषा आम जनता के बीच और दरबारों में लोकप्रिय होने लगी। इस प्रकार उर्दू भाषा ने अपनी पहचान बनाई और एक साहित्यिक, सांस्कृतिक और संवादात्मक माध्यम के रूप में विकसित हुई।
2. प्रश्न: اردو کے معنی اور اس کے آغاز کی خصوصیات क्या हैं?
उत्तर:اردو का अर्थ "लश्करी भाषा" या "सेना की भाषा" होता है क्योंकि इसका आरंभ मुसलमानों की सेना और दरबार में हुआ था। इस भाषा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह एक मिश्रित भाषा थी, जिसमें भारत की स्थानीय भाषाओं की मिठास और सहजता के साथ फारसी और अरबी के भव्य और आध्यात्मिक शब्द सम्मिलित थे। शुरू में पढ़े-लिखे लोग इस भाषा को अपनाने में झिझकते थे क्योंकि यह उनके लिए नई और असामान्य प्रतीत होती थी, लेकिन धीरे-धीरे इसका प्रयोग आम लोगों और साहित्यिक समुदाय में फैल गया। उर्दू भाषा की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता इसकी लचीलापन और सौंदर्य है—यह सरल, मधुर और शैलीगत रूप से आकर्षक है। समय के साथ यह भाषा न केवल संवाद का माध्यम बनी, बल्कि साहित्य, कविता, प्रशासन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का भी एक शक्तिशाली साधन बन गई।
3. प्रश्न: اردو زبان کی ترقی میں عوام اور شاعروں की भूमिका क्या थी?
उत्तर:اردو भाषा की प्रगति में सबसे महत्वपूर्ण योगदान आम जनता और शायरों का रहा। आम लोग इसे अपनी दैनिक बातचीत, लोककथाओं और कहावतों के माध्यम से जीवित रखते थे, जिससे यह भाषा सरल, संवादात्मक और जीवन्त बनी रही। वहीं, शाही दरबार, अधिकारी और सूफी संत भाषा को संरक्षित और विकसित करने में लगे। कवियों और लेखकों ने उर्दू में कविता, नज़्म, गज़ल और कहानियाँ रचकर इसमें सौंदर्य और भावनात्मक गहराई जोड़ी। उनके प्रयासों ने भाषा को केवल बोलचाल का माध्यम नहीं, बल्कि साहित्यिक और सांस्कृतिक पहचान दिलाई। इस प्रकार आम जनता की बोली और शायरों के साहित्यिक योगदान का सम्मिलन उर्दू भाषा को एक सम्पूर्ण, समृद्ध और प्रतिष्ठित माध्यम बनाने में सहायक रहा।
4. प्रश्न: اردو भाषा میں ہندی، فارسی और عربی शब्दों का योगदान कैसे हुआ?
उत्तर:اردو भाषा کی संपन्नता और विविधता में हندي, फारसी और अरबी शब्दों का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। हिंदी और स्थानीय बोलियों ने भाषा की मूल संरचना, सरलता और सहजता प्रदान की, जिससे यह आम लोगों के लिए आसानी से समझने योग्य बनी। फारसी शब्दों ने इसमें शान, शैली और साहित्यिक सुंदरता जोड़ी, जिससे भाषा में उच्च स्तरीय अभिव्यक्ति की क्षमता विकसित हुई। अरबी शब्दों ने धार्मिक और आध्यात्मिक आयाम जोड़कर भाषा को आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टि से भी समृद्ध किया। इन तीनों भाषाओं के प्रभावों का संयोजन उर्दू को केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि साहित्यिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी प्रभावशाली और प्रासंगिक बनाता है। इस मिश्रण के कारण उर्दू भाषा ने समय के साथ न केवल लोकप्रियता प्राप्त की बल्कि साहित्य और कला के क्षेत्र में भी अपनी विशेष पहचान बनाई।
5. प्रश्न: مغلیہ سلطنت کے آخر में شاعروں का اردو भाषा पर प्रभाव क्या था?
उत्तर:मुगल साम्राज्य के अंतिम दौर में उर्दू भाषा की स्थिति एक संक्रमणकालीन रूप में थी। इस समय के शायरों ने भाषा को सिर्फ बोलचाल का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि इसे साहित्यिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी समृद्ध किया। उन्होंने भाषा में नई शब्दावली और अभिव्यक्ति की शैलियाँ जोड़ीं, जिससे यह अधिक आकर्षक और गहन बन गई। शायरों ने अपनी कविताओं, गज़लों और नज़्मों के माध्यम से उर्दू को संरक्षण दिया और इसे शैली, शान और भावनात्मक गहराई प्रदान की। उनका योगदान भाषा की साहित्यिक मान्यता और प्रशासनिक उपयोगिता को भी सुनिश्चित करने में निर्णायक रहा। इस प्रकार शायरों की मेहनत और सृजनात्मकता ने उर्दू भाषा को आधुनिक और प्रभावशाली रूप में स्थापित किया।
6. प्रश्न: مغلیہ سلطنت کے زوال کے بعد اردو भाषा की स्थिति क्या हुई?
उत्तर:मुगल साम्राज्य के पतन के बाद भारत में नई यूरोपीय शक्तियों, विशेष रूप से अंग्रेजों का उदय हुआ। इस नए शासन ने प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्यों के लिए फारसी की जगह धीरे-धीरे उर्दू को अपनाना शुरू किया। दरबारों, कार्यालयों और शिक्षा के क्षेत्र में उर्दू का प्रयोग बढ़ा, जिससे यह भाषा न केवल आम लोगों की बोली बन गई, बल्कि सरकारी और प्रशासनिक दस्तावेजों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगी। इसी समय साहित्यकारों और कवियों ने उर्दू में लेखन और रचनाओं को जारी रखा, जिससे भाषा की साहित्यिक समृद्धि और सांस्कृतिक पहचान बनी रही। इस प्रकार, मुगलों के बाद भी उर्दू ने नई परिस्थितियों में अपने अस्तित्व और प्रभाव को बनाए रखा और आधुनिक भारतीय भाषाओं में अपनी विशेष स्थिति स्थापित की।
7. प्रश्न: اردو کی بنیاد किस भाषा पर है और क्यों?
उत्तर:उर्दू की मूल आधारशिला मुख्यतः उत्तर भारत की प्राचीन भाषाओं, विशेषकर हिन्दी और प्राकृत पर रखी गई है। भाषा की व्याकरणिक संरचना, वाक्य विन्यास और मूल शब्दावली इसी क्षेत्रीय भाषा से ली गई है। हालांकि, समय के साथ इसमें फारसी, अरबी और अंग्रेज़ी जैसे विदेशी भाषाओं के शब्द भी शामिल हुए, जिससे यह और अधिक समृद्ध और विविध हो गई। इस मिश्रण ने उर्दू भाषा को न केवल बोलचाल के लिए उपयोगी बनाया, बल्कि इसे साहित्यिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी सशक्त और आधुनिक बना दिया। हिन्दी की सरलता और मिठास ने भाषा की सहजता बनाए रखी, जबकि फारसी और अरबी के शब्दों ने इसे शान, गरिमा और शैली प्रदान की। इस प्रकार उर्दू का मूल हिन्दी पर आधारित होने के बावजूद यह बहुभाषिक प्रभावों के कारण एक समृद्ध और प्रभावशाली भाषा बन गई।
8. प्रश्न: اردو भाषा में عربی और فارسی शब्दों के लाभ क्या हैं?
उत्तर:उर्दू भाषा में अरबी और फारसी शब्दों का समावेश इसे विशेष रूप से समृद्ध और बहुआयामी बनाता है। अरबी शब्दों ने भाषा में धार्मिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक आयाम जोड़े, जिससे गहरी विचारधारा और मानसिकता को व्यक्त करना आसान हुआ। फारसी शब्दों ने भाषा में शैली, शान और सौंदर्य बढ़ाया, जिससे यह बोलचाल के अलावा साहित्यिक अभिव्यक्ति का माध्यम भी बन गई। इस प्रकार, अरबी और फारसी शब्दों का मिश्रण उर्दू को केवल संवाद की भाषा नहीं बल्कि साहित्य, कविता, गज़ल और प्रशासनिक लेखन में भी सशक्त और प्रभावशाली बनाता है। यह संयोजन भाषा की शब्दावली को बढ़ाता है, भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति को सुगम बनाता है, और उर्दू को एक समृद्ध, सुरुचिपूर्ण और बहुपरिपाटी भाषा के रूप में स्थापित करता है।
9. प्रश्न: اردو میں अंग्रेज़ी शब्दों का प्रभाव क्या है?
उत्तर:उर्दू भाषा में अंग्रेज़ी शब्दों का प्रवेश मुख्यतः आधुनिक समय में हुआ है और यह अधिकतर तकनीकी, वैज्ञानिक, प्रशासनिक और सामाजिक संदर्भों में देखने को मिलता है। इन शब्दों ने भाषा की मूल संरचना और व्याकरण को प्रभावित नहीं किया, बल्कि केवल शब्दावली में विस्तार और नवीनता जोड़ दी। अंग्रेज़ी शब्दों के समावेश से उर्दू अब आधुनिक विचारों, विज्ञान और तकनीक के विषयों को आसानी से व्यक्त करने में सक्षम हो गई है। इस प्रक्रिया ने भाषा की उपयोगिता और समृद्धि को बढ़ाया, और इसे केवल पारंपरिक साहित्यिक माध्यम से हटाकर आधुनिक समय की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया। इस प्रकार उर्दू भाषा ने विदेशी प्रभावों को अपनाकर भी अपनी मूल पहचान और मिठास बनाए रखी।
10. प्रश्न: اردو کی مقبولیت کی प्रमुख वजहें क्या हैं?
उत्तर:उर्दू भाषा की लोकप्रियता का मुख्य कारण इसकी सहजता, मिठास और अभिव्यक्ति की शैली है। यह भाषा इतनी लचीली और सरल थी कि आम लोग इसे अपनी दैनिक बातचीत में आसानी से अपना सकते थे, जिससे यह धीरे-धीरे जनता के बीच लोकप्रिय हुई। इसके अलावा, शायरों, कवियों और सूफी संतों ने इसे साहित्यिक और आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध किया। उन्होंने उर्दू में नज़्म, ग़ज़ल, कथा और धार्मिक अभिव्यक्ति के माध्यम से भाषा को और अधिक आकर्षक और भावनात्मक रूप दिया। फारसी और अरबी के शब्दों ने इसे शान, गरिमा और प्रभावशीलता प्रदान की, जिससे यह उच्च स्तरीय अभिव्यक्ति के लिए भी उपयुक्त बन गई। प्रशासनिक, साहित्यिक और संवादात्मक उपयोग में इसका व्यापक प्रसार हुआ, जिससे उर्दू ने न केवल आम जनता में बल्कि शाही दरबारों और शिक्षित वर्ग में भी विशेष स्थान प्राप्त किया। इस प्रकार, सरलता, साहित्यिक सौंदर्य और बहुभाषिक प्रभावों का मिश्रण उर्दू की प्रमुख लोकप्रियता का कारण बना।
11. प्रश्न: اردو زبان के آغاز में عوام اور علماء کی भूमिका क्या थी?
उत्तर:उर्दू भाषा के प्रारंभिक दौर में आम जनता और विद्वानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। आम लोग इसे अपनी दैनिक बोलचाल में प्रयोग करके जीवित रखते थे, जिससे भाषा में सहजता और प्राणवत्ता बनी रही। वहीं, शाही दरबार के विद्वान और सूफी संत इस भाषा को साहित्यिक दृष्टि से विकसित करने में लगे। उन्होंने उर्दू में कविताएँ, नज़्में, गज़लें और धार्मिक ग्रंथ लिखकर इसे साहित्यिक प्रतिष्ठा प्रदान की। शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में इस भाषा का उपयोग बढ़ता गया, जिससे यह केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि सांस्कृतिक, धार्मिक और प्रशासनिक पहचान भी बनने लगी। इस तरह आम लोगों की बोली और विद्वानों का सृजनात्मक योगदान मिलकर उर्दू को समृद्ध, बहुआयामी और समाज में व्यापक रूप से स्वीकार्य भाषा बनाने में सहायक रहा।
12. प्रश्न: اردو زبان کی بنیاد اور ہندی का रिश्ता क्या है?
उत्तर:उर्दू भाषा की मूल आधारशिला मुख्यतः हिंदी पर टिकी हुई है। इसके व्याकरण, क्रियाएँ, सर्वनाम, वाक्य विन्यास और मूल शब्दावली हिंदी से ही ली गई हैं। हालांकि समय के साथ इसमें फारसी, अरबी और अंग्रेज़ी जैसे विदेशी शब्दों का समावेश हुआ, परंतु भाषा की मूल संरचना, मिठास और सहजता हिंदी से ही आती है। यह इस बात का प्रमाण है कि उर्दू मूल रूप से भारतीय सांस्कृतिक और भाषाई परंपरा से जन्मी है। विदेशी शब्दों ने इसे अधिक शान, शैली और साहित्यिक समृद्धि प्रदान की, लेकिन इसके मूल व्याकरण और अभिव्यक्ति की सरलता हिंदी से ही बनी रही। इस प्रकार, उर्दू और हिंदी का सम्बन्ध गहरा और अटूट है, जहां हिंदी भाषा ने उर्दू की आधारभूत संरचना और मिठास को सुनिश्चित किया।
13. प्रश्न: اردو میں شیرینی اور شان و شوکت का संयोजन कैसे हुआ?
उत्तर:उर्दू भाषा में मिठास और शान का अद्भुत संयोजन प्राकृतिक रूप से विकसित हुआ। हिंदी और प्राकृत की मिठास ने भाषा को सहज, सरल और मधुर बना दिया, जिससे यह आम लोगों के लिए बोली और संवाद का आसान माध्यम बन गई। वहीं, फारसी और अरबी शब्दों ने भाषा में शान, गरिमा और साहित्यिक प्रभाव जोड़ा, जिससे यह उच्चस्तरीय अभिव्यक्ति और कविता के लिए उपयुक्त बन गई। इस प्रकार, सरल और मधुर शब्दों का मेल शान और शैली के साथ हुआ, जिसने उर्दू को न केवल बोली जाने वाली भाषा बल्कि साहित्य, प्रशासन और सांस्कृतिक दृष्टि से भी समृद्ध और आकर्षक बना दिया। यह मिश्रण भाषा को भावनात्मक, सांस्कृतिक और सौंदर्यपूर्ण दृष्टि से पूर्ण बनाता है।
14. प्रश्न: اردو میں مغلیہ دور کے بعد دفاتر में تبدیلی कैसे आई?
उत्तर:मुगल साम्राज्य के पतन के बाद भारत में यूरोपीय शक्तियों, विशेष रूप से अंग्रेजों ने प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े बदलाव किए। इस नए प्रशासन ने फारसी भाषा को धीरे-धीरे हटाकर उर्दू को अपने कार्यालयों और दरबारों में मुख्य भाषा के रूप में अपनाया। इसका परिणाम यह हुआ कि उर्दू न केवल आम जनता की बोली बन गई, बल्कि प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्यों में भी इसका व्यापक उपयोग होने लगा। इससे उर्दू भाषा की प्रतिष्ठा और महत्ता बढ़ी। साथ ही, प्रशासनिक दस्तावेजों, पत्राचार और न्यायिक प्रक्रियाओं में उर्दू का प्रयोग बढ़ने से भाषा की शुद्धता और साहित्यिक विकास को भी बल मिला। इस परिवर्तन ने उर्दू को केवल एक बोली से निकालकर समाज और शासन के हर क्षेत्र में प्रभावशाली और सम्मानित भाषा बना दिया।
15. प्रश्न: اردو کے آغاز में لشکری भाषा होने का महत्व क्या है?
उत्तर:उर्दू भाषा के प्रारंभिक दौर में इसे “لشکری زبان” कहा जाता था क्योंकि इसका मुख्य उपयोग मुसलमानों की सेना और शाही दरबार में होता था। इसका मतलब यह है कि भाषा का आरंभिक विकास सामरिक और प्रशासनिक आवश्यकताओं से हुआ। सैनिक और दरबारी संवाद की सरलता, स्पष्टता और संक्षिप्तता इस भाषा की विशेषताएँ थीं। समय के साथ, यह केवल संवाद का माध्यम नहीं रह गई, बल्कि साहित्यिक और सांस्कृतिक विकास का साधन बन गई। शायरों और विद्वानों ने इसे कविताओं, नज़्मों और गज़लों में संवारा, जिससे यह शैलीशाली, मधुर और प्रभावशाली भाषा बन गई। इस प्रकार, उर्दू की प्रारंभिक “लशकरी” पहचान ने इसे व्यवस्थित रूप से विकसित होने का अवसर दिया और बाद में इसे साहित्य, प्रशासन और आम संवाद में व्यापक उपयोग का मार्ग प्रशस्त किया।
16. प्रश्न: اردو میں عوام کی بولیوں का اثر कैसे दिखता है?
उत्तर:उर्दू भाषा में आम लोगों की स्थानीय बोलियों का प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों की बोलियाँ और उनकी मिठास, ध्वनि और शब्दावली उर्दू की मूल संरचना में समाहित हुई। इस लोक प्रभाव के कारण भाषा में सहजता, सरलता और जीवंतता आई, जिससे यह केवल एक शाही या विद्वानों की भाषा नहीं रह गई, बल्कि आम जनता के दैनिक संवाद में भी प्रचलित हो गई। स्थानीय बोलियों ने शब्दों की उच्चारण शैली, वाक्य संरचना और भावनात्मक अभिव्यक्ति को समृद्ध किया। इसके परिणामस्वरूप उर्दू भाषा ने साहित्यिक रचनाओं में भी अपनी लय, माधुर्य और भावनात्मक गहराई बनाए रखी। इस तरह, आम लोगों की बोलियाँ उर्दू को जीवंत, आकर्षक और व्यवहारिक बनाती हैं, जिससे यह समाज के सभी वर्गों में स्वीकार्य और प्रिय बनी।
17. प्रश्न: اردو میں مغلیہ شاعروں نے کس तरह भाषा को سنوارا؟
उत्तर:मुगल काल के शायरों ने उर्दू भाषा को केवल बोलने का माध्यम नहीं बल्कि साहित्यिक सौंदर्य और अभिव्यक्ति का साधन बनाया। प्रारंभिक उर्दू में जहाँ शब्दावली और व्याकरणिक संरचना तो थी, वहीं शायरों ने इसमें शैली, लय और भावनाओं का समृद्धि भरा योगदान दिया। उन्होंने नज़्म, गज़ल और कथा लेखन में इसे प्रयोग किया, जिससे भाषा में भावनात्मक गहराई, रचनात्मकता और सौंदर्य की अनुभूति हुई। इसके अलावा, उन्होंने फारसी और अरबी के शब्दों को उर्दू में समाहित कर इसे शान और गरिमा दी। शायरों के इन प्रयासों के कारण उर्दू भाषा केवल संवाद की भाषा नहीं रह गई, बल्कि यह साहित्यिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध और सम्मानित भाषा बन गई। इस प्रकार, मुगल शायरों ने उर्दू को संरचना, शैली और सौंदर्य दोनों में उन्नत कर इसे लोकप्रिय और प्रभावशाली बनाया।
18. प्रश्न: اردو میں عربی اور فارسی الفاظ کی اہمیت पर विस्तृत चर्चा करें।
उत्तर:उर्दू भाषा में अरबी और फारसी शब्दों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुआयामी रहा है। अरबी शब्दों ने भाषा में धार्मिक और आध्यात्मिक आयाम जोड़े। इसने धार्मिक ग्रंथों, सूफी रचनाओं और आध्यात्मिक विचारों को व्यक्त करने की क्षमता बढ़ाई। दूसरी ओर, फारसी शब्दों ने भाषा में शैली, शान, अभिव्यक्तिशीलता और सौंदर्य का आयाम जोड़ा। फारसी शब्दों की मधुरता और रचनात्मकता ने उर्दू को साहित्यिक रूप से समृद्ध किया।
इन दोनों भाषाओं के शब्दों के मिश्रण से उर्दू भाषा न केवल शब्दावली में विस्तारित हुई, बल्कि भाव, लय और शैली में भी अधिक प्रभावशाली बनी। इसका परिणाम यह हुआ कि उर्दू भाषा प्रशासनिक, साहित्यिक और संवादात्मक रूप से सक्षम बन गई। अरबी शब्द विचारों और आध्यात्मिक गहराई का प्रतीक हैं, जबकि फारसी शब्द भाषा में शान और सौंदर्य का प्रतीक हैं। इस तरह, उर्दू भाषा का सौंदर्य और समृद्धि इन दोनों विदेशी भाषाओं के शब्दों के संतुलित मिश्रण से प्राप्त हुई, जिससे यह एक वैश्विक और आधुनिक भाषा के रूप में विकसित हुई।
19. प्रश्न: اردو میں جدید शब्दों का समावेश कैसे हुआ?
उत्तर:आज के समय में उर्दू भाषा में अंग्रेज़ी और अन्य विदेशी भाषाओं के शब्द धीरे-धीरे समाहित हो रहे हैं। यह समावेश मुख्य रूप से तकनीकी, वैज्ञानिक, प्रशासनिक और आधुनिक जीवन से जुड़े संदर्भों में हुआ है। उदाहरण के लिए, कंप्यूटर, इंटरनेट, विज्ञान और व्यवसायिक क्षेत्रों के शब्द उर्दू में सीधे शामिल किए जा रहे हैं।
हालांकि, इन नए शब्दों के प्रवेश से उर्दू की मूल संरचना, व्याकरण और हृदयस्पर्शी मिठास पर कोई गंभीर असर नहीं पड़ा। उल्टा, यह भाषा की उपयोगिता, आधुनिकता और व्यापकता को बढ़ाता है। इसका परिणाम यह हुआ कि उर्दू अब सिर्फ पारंपरिक साहित्य या रोज़मर्रा की बोली तक सीमित नहीं रही, बल्कि आधुनिक जीवन और वैश्विक संदर्भ में भी संवाद का सशक्त माध्यम बन गई। इस प्रकार, नई शब्दावली ने भाषा को समय के साथ जीवंत, लचीला और प्रासंगिक बनाए रखा।
20. प्रश्न: हिंदी शब्दों और बोलियों का साहित्यिक योगदान क्या है?
उत्तर:हिंदी शब्दों और स्थानीय बोलियों का उर्दू भाषा में योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। इन शब्दों और बोलियों ने भाषा की मूल संरचना को जीवंत रखा और इसे आम लोगों के लिए सुलभ बनाया। हिंदी की मिठास और सहजता ने उर्दू के उच्चारण, व्याकरण और भावनात्मक अभिव्यक्ति को सरल और प्रभावशाली बनाया।
साहित्यिक दृष्टि से, हिंदी के शब्द कविताओं, गज़लों और कहानी लेखन में भाषा की सुंदरता और भावनात्मक गहराई बढ़ाते हैं। आम बोलियों से भाषा में रोज़मर्रा की संवाद क्षमता आती है, जिससे उर्दू केवल शाही या विद्वानों की भाषा नहीं रह जाती, बल्कि जनता की भाषा बन जाती है। इस मिश्रण से उर्दू में न केवल संवादात्मक सहजता आई, बल्कि साहित्यिक रचनाओं में जीवन्तता, भावनाओं की स्पष्टता और सांस्कृतिक विविधता भी समाहित हुई। यही कारण है कि हिंदी शब्द और बोलियाँ उर्दू भाषा को सरल, मधुर और साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध बनाती हैं।
21. प्रश्न: फारसी शब्दों का साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान क्या है?
उत्तर:फारसी शब्दों ने उर्दू भाषा को साहित्यिक और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध किया है। इन शब्दों की मधुरता और शैली ने कविताओं, गज़लों, नज़्मों और कथाओं में भाषा को एक विशेष आकर्षण और शान प्रदान की। फारसी शब्दों के माध्यम से भावों की गहराई और अभिव्यक्ति की सुंदरता बढ़ती है।
सांस्कृतिक दृष्टि से, फारसी शब्दों ने भाषा में शाही और प्रशासनिक वातावरण का प्रभाव छोड़ा। मुग़ल दरबार और सूफी साहित्य में फारसी शब्दों का उपयोग उर्दू को एक विशिष्ट पहचान और गरिमा देता है। ये शब्द उर्दू साहित्य को शालीनता, शैली और रचनात्मकता प्रदान करते हैं, जिससे भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि कला, संस्कृति और भावनाओं के संचार का साधन बन जाती है। इस तरह, फारसी शब्दों का योगदान उर्दू भाषा की शान, साहित्यिक सुंदरता और सांस्कृतिक गहराई को बढ़ाने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
Answer by Mrinmoee