Chapter 10 

                                                चलें मण्डी घूमने  


प्रश्न 1.इस रेखा चित्र के अनुसार बड़े शहर की मंडी तक चावल पहुंचने के क्या-क्या तरीके हैं ?

उत्तर-इस रेखा चित्र से पता चलता है कि चावल बड़े शहर की मंडी तक पहुँचने के दो अलग-अलग रास्तों से गुजर सकता है।

पहला तरीका:
चावल सीधे किसान से चावल मिल में पहुँचता है। मिल में प्रोसेस होने के बाद इसे बिना किसी और मध्यस्थ के सीधे बड़े शहर के थोक विक्रेता के पास भेज दिया जाता है।

दूसरा तरीका:
चावल किसान के पास से पहले छोटे पिल तक पहुँचता है। वहाँ प्रोसेस होने के बाद उसे स्थानीय छोटे व्यापारी को बेचा जाता है। फिर वही व्यापारी इसे स्थानीय मंडी के थोक विक्रेता को देता है, और अंत में वह थोक विक्रेता इसे बड़े शहर के थोक व्यापारी तक पहुँचाता है।

इस प्रकार रेखा चित्र के अनुसार चावल बड़े शहर तक एक सीधे मार्ग से भी पहुँच सकता है और कई मध्यस्थों से होकर भी पहुँच सकता है।

प्रश्न 2.थोक और खुदरा बाजार में क्या अंतर है?

उत्तर-थोक और खुदरा बाजार के बीच मुख्य फर्क वस्तु की मात्रा और व्यापार के पैमाने का होता है।

थोक बाजार:
यहाँ वस्तुओं की खरीद–फरोख्त बहुत बड़ी मात्रा में की जाती है। सामान बोरे, क्विंटल, या टन के हिसाब से बेचा जाता है, किलो या पाव जैसी छोटी मात्रा नहीं मिलती। उदाहरण के तौर पर अगर कोई थोक बाजार में चावल खरीदेगा तो वह बोरी या कई बोरी के हिसाब से ही ले सकेगा।

खुदरा बाजार:
यह बाजार आम उपभोक्ताओं के लिए होता है, जहाँ वस्तुएँ कम मात्रा में बेची जाती हैं। यहाँ ग्राहक जितनी जरूरत हो उतना खरीद सकता है — जैसे पाव, आधा किलो या एक–दो किलो तक भी सामान उपलब्ध रहता है। उदाहरण के लिए अगर किसी को केवल पाव भर चावल चाहिए, तो उसे खुदरा दुकान से आसानी से मिल जाएगा।

इस प्रकार थोक बाजार बड़े पैमाने पर व्यापार के लिए, जबकि खुदरा बाजार सामान्य ग्राहकों की रोजमर्रा की ज़रूरतों के लिए होता है।

प्रश्न 3.थोक बाजार की जरूरत क्यों होती है? चर्चा करें।

उत्तर-थोक बाजार की आवश्यकता इसलिए होती है क्योंकि यह उत्पादन और खुदरा व्यापार के बीच एक बड़ा केंद्र बनकर काम करता है। किसान या निर्माता अपने सामान को सीधे प्रत्येक खुदरा दुकानदार तक नहीं पहुँचा सकते, इसलिए माल पहले बड़ी मात्रा में थोक बाजार में आता है। इसके बाद खुदरा व्यापारी वहीं से अपनी दुकानों के लिए आवश्यक मात्रा में सामान खरीद लेते हैं।

थोक बाजार मौजूद होने से खुदरा व्यापारियों को दूर की मंडियों में जाकर खरीदारी नहीं करनी पड़ती; उन्हें अपने शहर या क्षेत्र के थोक बाजार में एक ही जगह पर सारी वस्तुएँ उपलब्ध मिल जाती हैं। साथ ही, यदि किसी कार्यक्रम या समारोह के लिए बहुत अधिक मात्रा में सामान खरीदना हो, तो आम उपभोक्ता भी थोक बाजार से सामान जुटा सकते हैं और बड़ी मात्रा में खरीदने के कारण उन्हें कीमत भी अपेक्षाकृत कम मिलती है।

इस प्रकार थोक बाजार व्यापार को सरल, केंद्रीकृत और लागत–किफ़ायती बनाता है।

प्रश्न 4.छोटे किसान को चावल का कम मूल्य क्यों मिलता है?

उत्तर-छोटे किसानों को उनके चावल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता क्योंकि वे मजबूरी के कारण फसल तैयार होते ही उसे बेच देते हैं। उनके पास भंडारण की सुविधा, पूँजी और बड़े व्यापारियों तक पहुँच नहीं होती, इसलिए वे स्थानीय छोटे खरीदार या बिचौलिए को ही चावल बेच देते हैं। ऐसे व्यापारी तुरंत नकद भुगतान तो कर देते हैं, लेकिन कीमत कम तय करते हैं। इसलिए छोटे किसान मेहनत के बावजूद अपेक्षित लाभ नहीं कमा पाते।

प्रश्न 5.इन फसलों में से दो फसलों के बाजार की कड़ियों (किसान से उपभोक्ता) का रेखा-चित्र बनाएँ, जो आपके इलाके में उगाया जाता है।

1. गेहूँ

2. मक्का

3. दलहन

4. सरसों।

उत्तर-(i) गेहूँ की बाजार श्रृंखला (किसान से उपभोक्ता तक):

किसान ➜ स्थानीय छोटा व्यापारी ➜ स्थानीय मंडी का थोक व्यापारी ➜ बड़े शहर का थोक विक्रेता ➜ खुदरा दुकानदार ➜ उपभोक्ता

इस प्रक्रिया में गेहूँ कई स्तरों से गुजरता है और हर स्तर पर कीमत बढ़ती जाती है।

(ii) सरसों की बाजार श्रृंखला (किसान से उपभोक्ता तक):
किसान ➜ मिल / तेल पेराई केंद्र ➜ थोक मंडी ➜ बड़े शहर का थोक विक्रेता ➜ खुदरा दुकानदार ➜ उपभोक्ता

सरसों पहले मिल में भेजी जाती है जहाँ तेल तैयार होता है, उसके बाद तेल थोक और खुदरा व्यापार के माध्यम से उपभोक्ता तक पहुँचता है।

प्रश्न 6.तुम्हारे आस-पास कोई मिल है क्या? वहाँ फसल कैसे पहुँचती है? पता लगाओ।

उत्तर-हाँ, मेरे आसपास एक मिल मौजूद है। वहाँ फसल पहुँचने के दो तरीके होते हैं। कभी-कभी मिल वाले थोक मंडी से बड़ी मात्रा में अनाज खरीदकर मंगवाते हैं, और कई बार वे सीधे बड़े किसानों से भी फसल खरीद लेते हैं ताकि बीच के व्यापारियों पर निर्भर न रहना पड़े। इस तरह मंडी और किसान — दोनों ही माध्यमों से फसल मिल तक पहुँचती है।

प्रश्न 7.सरकार द्वारा चलायी गयी नियंत्रित मंडी क्या है? शिक्षक के साथ चर्चा करें।

उत्तर-सरकार द्वारा संचालित नियंत्रित मंडी ऐसी व्यवस्था है जहाँ किसान अपनी फसल को खुले और पारदर्शी बोली (नीलामी) के माध्यम से बेच सकते हैं। इस प्रकार की मंडी में कई खरीदार उपस्थित होते हैं और प्रतिस्पर्धा के कारण किसानों को अपनी उपज का उचित और बेहतर मूल्य प्राप्त होता है।

जब नियंत्रित मंडियाँ उपलब्ध नहीं होतीं, तो किसानों को अपनी फसल मजबूरी में निजी व्यापारियों या मिल मालिकों को बेचनी पड़ती है। ऐसे में बीच वाले व्यापारी किसानों की कमज़ोरी का लाभ उठाकर कम कीमत तय कर देते हैं। इसलिए नियंत्रित मंडियों का उद्देश्य किसानों के लिए सुरक्षित और न्यायसंगत मूल्य सुनिश्चित करना होता है।

प्रश्न 8.शीतगृहों के निर्माण से किसे फायदा हो सकता है ? चर्चा करें।"

उत्तर-शीतगृहों के बनने से मुख्य लाभ उन लोगों को मिलेगा जो फल-सब्जी का उत्पादन या व्यापार करते हैं। जब मौसम में उपज अधिक होती है और उतनी खपत नहीं हो पाती, तो फल और सब्जियाँ जल्दी खराब होने लगती हैं और व्यापारी तथा किसान दोनों को नुकसान झेलना पड़ता है।

यदि शीतगृह उपलब्ध हों, तो ऐसी नाशवंत वस्तुओं को सुरक्षित तापमान में लंबे समय तक रखा जा सकता है। इससे फसल न सूखेगी, न सड़ेगी और किसान-व्यापारी उचित समय पर सही कीमत पर उत्पाद बेच सकेंगे। इस प्रकार शीतगृह नुकसान कम करने और लाभ बढ़ाने में मददगार होते हैं।

प्रश्न 9.बिहार में फल प्रसंस्करण आधारित उद्योग लगाने की क्या-क्या संभावनाएं हैं? चर्चा करें।

उत्तर-बिहार में फल प्रसंस्करण आधारित उद्योग स्थापित होने की संभावनाएँ बहुत अधिक हैं, क्योंकि यह राज्य फलों की पैदावार के मामले में समृद्ध है। लीची, केला और गन्ना जैसी फसलों का उत्पादन यहाँ बड़े पैमाने पर होता है — विशेष रूप से लीची के उत्पादन में बिहार पूरे देश में अग्रणी है।

इतनी अधिक मात्रा में फल उपलब्ध होने के कारण इनसे बनने वाले उत्पाद — जैसे जूस, जैम, जेली, सिरप, अचार और शहद आदि — बनाने वाले उद्योगों को कच्चा माल आसानी से और कम लागत पर मिल सकता है। यदि ऐसे उद्योग स्थापित होते हैं तो न केवल उद्यमियों को लाभ मिलेगा, बल्कि किसानों को भी अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलेगा और स्थानीय लोगों के लिए रोज़गार के अवसर भी बढ़ेंगे।

इसलिए बिहार में फल प्रसंस्करण उद्योग के विकास की पूरी संभावनाएँ मौजूद हैं।

प्रश्न 10.अपने घर के आस-पास सर्वे करें कि पिछले 15 वर्षों में लोगों की फल को खपत में क्या-क्या परिवर्तन आए और क्यों?

उत्तर-पिछले 15 वर्षों में लोगों की फल खपत में noticeable बदलाव आया है। पहले लोग नियमित रूप से घर में फल लाते थे और बच्चों-बड़ों सभी को फल खिलाए जाते थे, लेकिन समय के साथ फल बहुत महंगे होते गए। बढ़ती महँगाई और सीमित आय के कारण अब आम परिवार अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों को प्राथमिकता देते हैं और फल खरीदना आवश्यक वस्तुओं की सूची से लगभग बाहर हो गया है।

आजकल जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी है, वही फल नियमित रूप से खरीद पाते हैं, जबकि गरीब और मध्यम वर्ग के लिए फल एक “कभी-कभार” वाली चीज़ बनकर रह गए हैं। कई लोग पहले दर्जन/टोकरा के हिसाब से फल लेते थे, लेकिन अब महँगे दामों के कारण लोग किलो या आधा किलो तक लेना भी सोच-समझकर तय करते हैं।

इस प्रकार, बढ़ती कीमतें और कमज़ोर क्रय-शक्ति फल की खपत में कमी आने का मुख्य कारण बनी हैं।

प्रश्न 11.स्वतंत्रता के पूर्व बिहार को देश का चीनी का कटोरा कहा जाता था। 1942-43 में राज्य में कुल 32 चीनी मिलें थीं जबकि देश मे मिर्फ 140 चीनी मिलें थीं। वहीं 2000 तक राज्य में चीनी मिलों की संख्या घटकर सिर्फ 10 रह गयी जबकि भारतवर्ष में चीनी मिलों की संख्या बढ़कर 495 हो गयी।

उत्तर-स्वतंत्रता से पहले बिहार में चीनी उद्योग की स्थिति बहुत मजबूत थी, इसी कारण उसे पूरे देश का ‘चीनी का कटोरा’ कहा जाता था। वर्ष 1942-43 में पूरे भारत में जहाँ 140 चीनी मिलें थीं, वहीं अकेले बिहार में 32 मिलें चल रही थीं। लेकिन समय बीतने के साथ परिस्थितियाँ बदलती गईं और वर्ष 2000 तक बिहार की चीनी मिलों की संख्या घटकर केवल 10 रह गई, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर चीनी मिलों की कुल संख्या बढ़कर 495 हो गई।

बिहार में चीनी मिलों के कम होने के पीछे कई कारण जिम्मेदार रहे—

  • पहले बिहार में उगने वाले गन्ने में रस की मात्रा अधिक होती थी, इसलिए कम गन्ने में भी ज्यादा चीनी बन जाती थी, जिससे लागत कम और लाभ अधिक होता था।

  • समय के साथ गन्ने की गुणवत्ता घटने लगी और अब उगने वाले गन्नों से बहुत अधिक मात्रा में रस नहीं निकलता। परिणामस्वरूप बहुत गन्ना लगाने पर भी थोड़ी ही चीनी मिलती है, जिससे लागत बढ़ना और मुनाफा घट जाना स्वाभाविक था।

  • इसके अलावा सरकार की ओर से चीनी उद्योगों को पर्याप्त सहयोग और संरक्षण नहीं मिला, जिसके कारण मिल मालिकों को लगातार नुकसान झेलना पड़ा।

इन्हीं कारणों से धीरे-धीरे अधिकतर चीनी मिलें बंद हो गईं और बिहार का चीनी उद्योग, जो कभी देश में सबसे मजबूत था, अपनी पुरानी पहचान खो बैठा।


प्रश्न 12.बिहार में मक्का उद्योग लगाने की काफी संभावनाएं हैं। इन इकाइयों के द्वारा मक्के के विभिन्न उत्पाद जैसे स्टार्च, बेबीकान, पॉपकार्न, कार्न-फ्लेक्स, मक्के का आटा, मुर्गियों का चारा, मक्के का तेल । आदि बनाया जा सकता है। इनके क्या फायदे नुकसान है, चर्चा

करें।

उत्तर-बिहार में मक्का आधारित उद्योग स्थापित होने की पर्याप्त संभावनाएँ हैं, क्योंकि राज्य में मक्के का उत्पादन बहुत अधिक होता है। मक्का से तैयार होने वाले उत्पाद — जैसे स्टार्च, बेबी-फूड, पॉपकॉर्न, कॉर्न-फ्लेक्स, मक्के का आटा, मुर्गियों का चारा और मक्के का तेल — विभिन्न उपयोगों में काम आते हैं।

इन उद्योगों के फायदे

  • मक्के के उत्पाद स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं माने जाते और इन्हें भोजन के रूप में सुरक्षित रूप से उपयोग किया जा सकता है।

  • मुर्गियों के चारे के रूप में उपयोग होने से पोल्ट्री उद्योग को लाभ मिलता है।

  • कच्चा माल (मक्का) स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होने से उत्पादन लागत कम आती है और मुनाफा अधिक मिलता है।

  • इन उत्पादों की मांग अन्य राज्यों में भी है, इसलिए निर्यात से राज्य की आय बढ़ती है।

इन उद्योगों के नुकसान बहुत कम हैं, क्योंकि इनके उत्पाद हानिकारक नहीं होते और अधिकांश उत्पाद खाद्य उत्पादन एवं पशु आहार के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। कुल मिलाकर, यह उद्योग बिहार की अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है।

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.आपके अनुसार अरहर किसान से किस प्रकार आपके घरों में दाल के रूप में पहुँचता है? दिये गये विकल्पों में से खाली बॉक्स भरें। विकल्प

1. दाल मिल

2. खुदरा व्यवसायी

3. स्थानीय छोटे व्यवसायी

4. बड़ी मंडी के थोक व्यवसायी

5. स्थानीय मंडी के थोक व्यवसायी

उत्तर-किसान दाल मिल स्थानीय छोटे व्यवसायी स्थानीय मंडी के थोक व्यवसायी बड़ी मंडी के थोक व्यवसायी - खुदरा व्यवसायी।

प्रश्न 2.स्तंभ 'क' को स्तंभ 'ख' से मिलान करें।

स्तंभ क

स्तंभ ख

(i) शाही लीची

(क) भागलपुर

(ii) दुधिया मालदह

(ख) मुजफ्फरपुर

(iii) मखाना

(ग) दीघा (पटना)

(iv) जर्दालु आम

(घ) दरभंगा 

उत्तर-1. शाही लीची- मुजफ्फरपुर

2 दधिया मालदह दीघा (पटना)

प्रश्न 3.कृषि उपजों के न्यूनतम समर्थन मूल्य से आप क्या समझते हैं? इससे किसानों को क्या फायदा होता है?

उत्तर-कृषि उपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) वह मूल्य है जिसे सरकार किसानों की उपज के लिए पहले से तय करती है, ताकि उनकी फसल बेकार न जाए और उन्हें उचित आमदनी मिल सके। MSP की व्यवस्था किसानों को बाजार के उतार–चढ़ाव से बचाने के लिए की जाती है। चाहे बाजार में कीमतें गिर जाएँ, सरकार एक निश्चित मूल्य पर किसानों की फसल खरीदती है।

इस योजना के फायदे किसानों के लिए

  • उन्हें अपनी मेहनत की सही कीमत मिलती है।

  • व्यापारी या बिचौलिए किसानों से फसल बहुत कम दर पर नहीं खरीद पाते।

  • नुकसान और घाटे की आशंका कम हो जाती है, इसलिए किसान अगली बार खेती करने के लिए प्रेरित होते हैं।

  • कृषि उत्पादन में स्थिरता आती है।

सरकारी एजेंसियाँ किसानों से उनकी फसल MSP पर ही खरीदती हैं। यदि MSP तय न हो तो व्यापारी फसल बहुत कम दाम पर खरीद लेते और किसानों को उनका हक नहीं मिलता। हालांकि बिहार में MSP की व्यवस्था पूरी तरह लागू न होने के कारण सभी किसानों को इसका पूरा लाभ नहीं मिल पाता है, और कई बार उन्हें मजबूरी में कम दाम पर ही फसल बेचनी पड़ती है।

प्रश्न 4.निम्नलिखित फसलों से बनाये जाने वाले विभिन्न उत्पादों को लिखें। इन उत्पादों को बनाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

उत्तर-फसल

उत्पाद

(i) गेहूँ.

सूजी, मैदा, आटा

(ii) मक्का

सत्तू, आटा, दर्रा

(iii) लीची

जूस, जैम, जेली, मधु

(iv) गन्ना

चीनी, गुड़

(V) जूट

थैला 

गेहूँ से सूजी, मैदा और आटा बनाने के लिए गेहूँ को मिल में भेजा जाता है, मक्का से भी सत्तू, आटा या दर्रा बनाने के मिल की आवश्यकता होती है। लीची से जुस, जैम, जेली या मधु बनाने के लिए इसे प्रसंस्करण उद्योग में भेजते हैं। गन्ना से चीनी बनाने के लिए हम गन्ने को चीनी मिल भेजते हैं और गड बनाने के लिए गन्ना की पेड़ाई करती हैं। जूट से मशीनों द्वारा थैला बनाया जाता है।

Answer by Mrinmoee