Chapter 9

                                         बाज़ार श्रृंखला खरीदने और बेचने की कड़ियाँ


1. मखाना किस प्रकार का उत्पाद है और कहाँ अधिक पैदा होता है?

उत्तर: मखाना एक जल-उत्पाद है जो तालाबों में उगता है। भारत में इसका सबसे अधिक उत्पादन बिहार में होता है। विशेष रूप से दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा, सुपौल, सीतामढ़ी, पूर्णिया, कटिहार और किशनगंज जिलों में मखाना की खेती होती है।


2. मखाना का उपयोग किन-किन चीजों में किया जाता है?

उत्तर: मखाना का इस्तेमाल व्रत और त्योहारों में, पूजा-पाठ तथा हवन की सामग्री के रूप में किया जाता है। इसके अलावा इसे खाने और नाश्ते में भी उपयोग किया जाता है। मखाना पौष्टिक होने के साथ-साथ अनेक औषधीय गुणों से भरपूर होता है।


3. हाबी मौआर गाँव में मखाना की खेती कौन करता है?

उत्तर: हाबी मौआर गाँव में मखाना की खेती प्रायः मछुआरों के द्वारा की जाती है, क्योंकि वे तालाब की देखभाल और मखाना उगाने में विशेष दक्षता रखते हैं।


4. सरकारी और निजी तालाब में मखाना की खेती कैसे होती है?

उत्तर: हाबी मौआर गाँव के लगभग 60% तालाब सरकारी हैं और इन्हें मछुआरों की सहकारी समितियों को तीन से सात साल के लिए निश्चित किराए पर दिया जाता है। बाकी 40% तालाब निजी स्वामित्व वाले हैं, जिनके मालिक आमतौर पर स्वयं मखाना की खेती नहीं करते बल्कि इसे कुशल मछुआरों को सौंप देते हैं।


5. मखाना की खेती में किस समुदाय की दक्षता आवश्यक होती है?

उत्तर: मखाना की खेती और लावा तैयार करने के लिए विशेष कौशल की आवश्यकता होती है, जो मुख्यतः मछुआरों के समुदाय में मौजूद होता है। इसलिए यह कार्य अधिकतर इसी समुदाय के लोग करते हैं।


6. सलमा मखाना की खेती क्यों करती है?

उत्तर: सलमा एक छोटी किसान हैं और उनके पास अपना तालाब नहीं है। इसलिए वह गाँव के किसी तालाब को किराए पर लेकर मखाना की खेती करती हैं। यह काम वे अपने अन्य पारंपरिक और मौसमी कार्यों के साथ-साथ करती हैं।


7. सहकारी समितियों से तालाब न मिलने का कारण क्या है?

उत्तर: छोटे मछुआरों को सहकारी समितियाँ छोटे तालाब नहीं देतीं। उन्हें केवल बड़े तालाबों का हिस्सा ही आवंटित होता है, जिसके लिए अधिक पूँजी की जरूरत होती है।


8. सलमा ने तालाब किराये पर क्यों लिया और कितने रुपये में?

उत्तर: सलमा ने इस साल भी पिछले वर्ष की तरह मखाना की खेती के लिए राज किशोर के 15 कट्टे के तालाब को सालाना 14,000 रुपये के किराए पर लिया।


9. मखाना की खेती में सलमा को पूँजी की आवश्यकता क्यों पड़ी?

उत्तर: सलमा को मखाना की खेती के लिए पूँजी की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि उसे तालाब का किराया, बीज, खाद, कीटनाशक और मजदूरी के खर्च के लिए अपने रिश्तेदारों से कर्ज लेना पड़ा।


10. बीते साल बाढ़ के कारण मखाना उत्पादन क्यों कम हुआ था?

उत्तर:पिछले वर्ष तालाब में आयी भयंकर बाढ़ के कारण मखाना के बीज बह गए थे, जिसके कारण उस साल मखाना का उत्पादन कम हुआ।


11. इस बार सलमा को अच्छे उत्पादन की संभावना क्यों थी?

उत्तर: इस साल सलमा को मखाना की अच्छी फसल की उम्मीद थी क्योंकि बाढ़ नहीं आई थी और उसने समय रहते खाद, कीटनाशक और पानी की उचित व्यवस्था की थी।


12. मखाना की फसल में गुड़ियों का क्या महत्व है?

उत्तर: गुड़ी मखाना का कच्चा फल होती है, जिससे मखाना का लावा तैयार किया जाता है। गुड़ियों से लावा बनाने की प्रक्रिया मेहनत और विशेष कौशल मांगती है।


13. गुड़ियों को तालाब से निकालने की प्रक्रिया कैसी होती है?

उत्तर: तालाब से गुड़ियों को निकालने के लिए मजदूर पानी में उतरकर तालाब की मिट्टी से गुड़ियों को इकट्ठा करते हैं। यह काम कठिन और मेहनत वाला होता है और इसके लिए विशेष कुशलता की जरूरत होती है।


14. गुड़ियों को कितनी बार निकाला जाता है और क्यों?

उत्तर: तालाब से गुड़ियों को तीन चरणों में निकाला जाता है। पहली बार सबसे अधिक गुड़ियाँ प्राप्त होती हैं, जबकि दूसरी और तीसरी बार में कम मात्रा बचने के कारण मजदूरों को अधिक मेहनत करनी पड़ती है।


15. सलमा ने तालाब से कुल कितनी गुड़ियाँ प्राप्त की?

उत्तर: सलमा ने तालाब से तीन चरणों में गुड़ियाँ प्राप्त कीं—पहली बार 300 किलो, दूसरी बार 200 किलो और तीसरी बार 100 किलो। इस प्रकार कुल गुड़ियों की मात्रा 600 किलो हुई।


16. गुड़ी निकालने में मजदूरी कितनी लगी और मजदूर प्रति दिन कितना कमा सकते हैं?

उत्तर:गुड़ियाँ निकालने के लिए सलमा ने कुल 12,000 रुपये मजदूरी दी। एक कुशल मजदूर इस काम से दिनभर में 300 से 400 रुपये कमा सकता है, लेकिन यह अवसर साल में केवल कुछ ही दिनों के लिए मिलता है।


17. गुड़ियों से मखाना कैसे बनता है?

उत्तर: गुड़ियों को पहले कड़ाही में बालू के साथ भूना जाता है। इसके बाद उन्हें पीढ़े पर रखकर लकड़ी के हथौड़े से पीटा जाता है। इस प्रक्रिया से गुड़ियों से लावा, जिसे मखाना कहा जाता है, निकलता है।


18. मखाना बनाने में कितनी गुड़ी से एक किलो लावा प्राप्त होता है?

उत्तर: मखाना का एक किलो लावा बनाने के लिए लगभग 2.5 किलो गुड़ी की आवश्यकता होती है। लेकिन लावा बनाने वाले आमतौर पर 3 किलो गुड़ी के बदले 1 किलो लावा देते हैं।


19. लावा बनाने वाले मजदूर एक दिन में कितनी गुड़ी से लावा बना सकते हैं?

उत्तर: चार से पाँच लोग मिलकर एक दिन में 150 से 200 किलो गुड़ी से लावा तैयार कर सकते हैं। इससे प्रत्येक मजदूर को लगभग 400 रुपये की आय होती है।


20. सलमा ने अपने मखाने को स्थानीय आढ़तिया को क्यों बेचा?

उत्तर: सलमा ने अपने मखाने को स्थानीय आढ़तिया शंभू को इसलिए बेचा क्योंकि उसके पास मखाना घर में रखने के लिए पर्याप्त जगह नहीं थी और उसे अपने रिश्तेदारों से लिया गया कर्ज लौटाना था।


21. आढ़तिया किस प्रकार मखाना बेचते हैं?

उत्तर: आढ़तिया मखाना खरीदकर दरभंगा और पटना की थोक मंडियों में बेचते हैं। बिक्री राशि में से वे 8-10 प्रतिशत कमीशन काटकर शेष राशि किसानों को भुगतान करते हैं।


22. थोक व्यापारी मखाना को कैसे बेचते हैं और उनका लाभ क्या होता है?

उत्तर: थोक व्यापारी मखाना बड़ी मात्रा में खरीदते हैं और इसे लगभग 20 रुपये प्रति किलो का लाभ जोड़कर खुदरा विक्रेताओं को बेचते हैं।


23. खुदरा दुकानदार मखाना कैसे बेचते हैं और उनका लाभ कितना है?

उत्तर: खुदरा दुकानदार मखाना को 380-400 रुपये प्रति किलो की कीमत से खरीदते हैं। इसे दुकान तक लाने में 10 रुपये प्रति किलो का खर्च आता है और वे इसे 460-500 रुपये प्रति किलो में ग्राहकों को बेचकर लाभ कमाते हैं।


24. थोक व्यापारी और खुदरा व्यापारी में क्या अंतर है?

उत्तर: थोक व्यापारी बड़े पैमाने पर मखाना खरीदते हैं और प्रति किलो कम मुनाफा लेते हैं, जबकि खुदरा व्यापारी छोटे पैमाने पर खरीदकर अधिक लाभ जोड़कर ग्राहकों को बेचते हैं।


25. थोक व्यापारी और खुदरा व्यापारी में कौन अधिक लाभ कमाता है और क्यों?

उत्तर: खुदरा व्यापारी ज्यादा लाभ कमाते हैं क्योंकि वे छोटी मात्रा में बेचते समय प्रत्येक किलो पर अधिक मुनाफा जोड़ सकते हैं, जबकि थोक व्यापारी बड़ी मात्रा में बेचते हैं और प्रति किलो कम लाभ पर संतुष्ट होते हैं।


26. मखाना उपभोक्ता तक पहुँचने में किन कड़ियों से गुजरता है?

उत्तर: मखाना उपभोक्ताओं तक कई चरणों से होकर जाता है: पहले सलमा तालाब से गुड़ियाँ निकालती है, फिर आशापुर में लावा बनता है। इसके बाद मखाना स्थानीय आढ़तियों को जाता है, फिर दरभंगा या पटना के थोक व्यापारी तक पहुंचता है। थोक व्यापारी इसे खुदरा दुकानदारों को बेचते हैं और अंत में शहरी उपभोक्ता या खाड़ी देशों के खुदरा दुकानदारों तक पहुँचता है।


27. दिल्ली के थोक व्यापारी मखाना कैसे खरीदते हैं और उनकी लागत क्या होती है?

उत्तर: दिल्ली के थोक व्यापारी मखाना सीधे दरभंगा या पटना से खरीदते हैं। इसके लिए उन्हें परिवहन और पैकिंग पर प्रति किलो लगभग 30 से 40 रुपये खर्च करने पड़ते हैं।


28. दिल्ली में खुदरा दुकानदार मखाना कैसे बेचते हैं?

उत्तर: दिल्ली के खुदरा दुकानदार मखाना को 500 से 600 रुपये प्रति किलो की कीमत पर बेचते हैं। कुछ बड़े और आधुनिक स्टोर्स में यह 600 से 800 रुपये प्रति किलो तक बिकता है, खासकर पैकेट वाले मखाने।


29. क्या बेहतर भाव का लाभ उत्पादक को मिल सकता है? यदि हाँ, कैसे?

उत्तर: हाँ, उत्पादक को ज़्यादा लाभ मिल सकता है। यदि वह अपनी उपज सीधे बड़े खरीदारों तक पहुँचाए — जैसे थोक मंडियों, प्रोसेसिंग कंपनियों, या निर्यात एजेंसियों तक — तो बिचौलियों की संख्या कम हो जाती है। इसके अलावा किसान उत्पादक संगठन (FPO), सहकारी समितियाँ या समूह बनाकर सामूहिक बिक्री करने से भी अच्छे दाम मिलते हैं, क्योंकि बड़ी मात्रा में माल होने पर व्यापारी ऊँचा भाव देने को तैयार होते हैं।


30. खाड़ी देशों में मखाना किस अवसर पर लोकप्रिय है?

उत्तर: खाड़ी देशों में मखाने की माँग खासकर त्योहारों के समय बहुत बढ़ जाती है। ईद के अवसर पर इसे खीर, सेवइयाँ, मिठाइयाँ और विभिन्न स्नैक्स में खूब इस्तेमाल किया जाता है। परिवारों के मिलन, दावतों और धार्मिक उत्सवों के दौरान मखाने से बने व्यंजन सम्मान और मेहमाननवाज़ी के रूप में परोसे जाते हैं, इसलिए यह उन अवसरों पर विशेष रूप से लोकप्रिय है।


31. बाज़ार में सभी लोगों की कमाई बराबर क्यों नहीं होती?

उत्तर: बाज़ार में हर व्यक्ति की कमाई समान नहीं होती क्योंकि सभी के पास साधन और व्यापार करने की क्षमता एक जैसी नहीं होती। किसान और मजदूर कड़ी मेहनत तो करते हैं, लेकिन पूँजी, तकनीक, भंडारण सुविधा और व्यापारिक नेटवर्क की कमी के कारण उन्हें सीमित आय मिलती है। वहीं बड़े दुकानदार और व्यापारी अधिक निवेश, प्रचार, पैकेजिंग, आकर्षक दुकान और ग्राहक पकड़ के ज़रिए ऊँचे दाम पर बेचते हैं, इसलिए उनका मुनाफ़ा ज़्यादा होता है।


32. मखाना उत्पादन में किसान का जोखिम क्या है?

उत्तर: मखाना उत्पादन किसान के लिए जोखिम भरा होता है क्योंकि छोटी-सी गलती या प्राकृतिक समस्या से पूरी फसल पर असर पड़ सकता है। बाढ़ आने पर तालाब क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, कीड़ों का प्रकोप बढ़ने पर फूल और बीज नष्ट हो जाते हैं, और कभी-कभी अच्छे बीज या पौध सामग्री उपलब्ध ना होने से उत्पादन घट जाता है। इसके अलावा तालाब का किराया, श्रम खर्च और रखरखाव भी बड़ा आर्थिक बोझ बन जाता है। इन स्थितियों के कारण किसान की आमदनी अनिश्चित रहती है।

33. सहकारी समितियाँ किसानों के लिए कैसे मददगार हैं?

उत्तर: सहकारी समितियाँ किसानों के लिए सहयोगी ढाँचे की तरह काम करती हैं। वे किसानों को तालाब उपलब्ध कराने, बीज और सामग्री की व्यवस्था करने और प्रशिक्षण दिलाने में सहायता करती हैं। साथ ही समितियाँ किसानों की उपज को एक साथ इकट्ठा करके बड़ी मात्रा में बेचने की व्यवस्था करती हैं, जिससे किसानों को बिना बिचौलियों के सीधे बाज़ार या बड़े व्यापारियों तक पहुँच मिलती है। इस तरह किसानों को बेहतर कीमत और स्थिर आय प्राप्त होती है।


34. मखाना आधारित उद्योग किस प्रकार बढ़ रहा है?

उत्तर: मखाना उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है क्योंकि अब मखाने का उपयोग सिर्फ पारंपरिक रूप में नहीं, बल्कि कई तरह के प्रोसेस्ड उत्पादों में किया जा रहा है। मखाने से रेडी-टू-कुक सेवइयाँ, इंस्टेंट खीर मिक्स, फ्लेवर वाले स्नैक्स, एनर्जी फ़ूड, प्रोटीन-रिच हेल्दी पैक और प्रीमियम पैकेटेड मखाना तक बाजार में उपलब्ध हैं। स्वास्थ्य-उन्मुख उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ने से इसकी खपत भारत के साथ-साथ खाड़ी देशों, यूरोप और अमेरिका में भी लगातार बढ़ रही है, जिससे उद्योग को बड़ा प्रोत्साहन मिल रहा है।


35. किसानों के लिए मखाना की खेती में कौन-कौन से खर्च शामिल होते हैं?

उत्तर: मखाना खेती करने में किसानों को कई प्रकार के खर्च उठाने पड़ते हैं। तालाब का किराया देना पड़ता है, फिर अच्छे बीज खरीदने की लागत होती है। पौधों की बढ़वार के लिए खाद और कीटनाशकों पर भी पैसा खर्च करना पड़ता है। इसके अलावा सिंचाई और निराई-गुड़ाई के लिए मजदूर रखने पड़ते हैं। अंत में लावा निकालने और तैयार करने की प्रक्रिया में भी मजदूरी लगती है। इन सभी खर्चों को जोड़कर देखें तो सलमा के मामले में कुल लागत लगभग 35,000 रुपये आई थी।


36. मखाना उत्पादन में किसे सबसे अधिक मेहनत करनी पड़ती है?

उत्तर: मखाना उत्पादन की पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा शारीरिक परिश्रम किसान और गुड़ी निकालने वाले मजदूर ही करते हैं। किसान तालाब की देखभाल, बुवाई, निराई-गुड़ाई और निगरानी में लगातार मेहनत करते हैं, जबकि मजदूर पानी में उतरकर बीजों (गुड़ी) को निकालते हैं और फिर उन्हें सुखाने व छीलने का कठिन काम करते हैं। इस कारण वास्तविक श्रम का सबसे बड़ा बोझ इन्हीं पर पड़ता है।


37. स्थानीय आढ़तियों का कार्य क्या है?

उत्तर: स्थानीय आढ़तियों का मुख्य काम खेत और बाज़ार के बीच कड़ी की तरह काम करना होता है। वे किसानों से मखाना खरीदकर उसे इकट्ठा करते हैं, फिर अपनी कमीशन या सेवा शुल्क काटकर उस माल को बड़े व्यापारियों या थोक मंडियों में बेच देते हैं। इस तरह आढ़तिया किसानों की उपज को आगे के बाज़ार तक पहुँचाने की पूरी व्यवस्था संभालते हैं।


38. मखाना की कीमत पर थोक और खुदरा व्यापारी का प्रभाव कैसे होता है?

उत्तर: मखाने की कीमत तय होने में थोक और खुदरा दोनों व्यापारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन प्रभाव अलग-अलग होता है। थोक व्यापारी बड़े पैमाने पर खरीद करते हैं, इसलिए वे बाज़ार में उपलब्धता को नियंत्रित रखते हैं और दाम को बहुत अधिक उतार–चढ़ाव होने नहीं देते। दूसरी तरफ खुदरा व्यापारी मखाना छोटे पैकेटों में ग्राहकों को बेचते हैं और इसमें अपना लाभ, दुकान का किराया तथा अन्य खर्च जोड़ देते हैं। इसी वजह से खुदरा बाजार में मखाने की कीमत थोक बाजार की तुलना में अधिक हो जाती है।


39. बाजार में समानता क्यों आवश्यक है?

उत्तर: बाज़ार में समानता इसलिए जरूरी है ताकि हर व्यक्ति अपनी मेहनत और कौशल के आधार पर उचित कमाई प्राप्त कर सके। जब किसानों, मजदूरों और छोटे उत्पादकों को भी बड़े व्यापारियों की तरह समान अवसर, उचित मेहनताना और सही दाम मिलते हैं, तो आर्थिक अंतर घटता है और समाज में न्याय व संतुलन कायम रहता है। इससे सभी वर्गों का जीवन स्तर सुधरता है और बाज़ार स्वस्थ और निष्पक्ष तरीके से चलता है।


40. मखाना की बाज़ार श्रृंखला से हमें क्या सीख मिलती है?

उत्तर: मखाने की बाज़ार श्रृंखला हमें यह समझाती है कि उत्पादन से लेकर उपभोक्ता तक पहुँचने की प्रक्रिया बहुत विस्तृत होती है और इसमें कई स्तर शामिल होते हैं। बाजार किसानों के लिए अवसर तो पैदा करता है, लेकिन सभी के लिए लाभ एक जैसा नहीं होता क्योंकि पूँजी, साधन, जानकारी और नेटवर्क की कमी छोटे उत्पादकों को पीछे कर देती है। इसलिए बाज़ार को अधिक न्यायसंगत बनाने के लिए ऐसी योजनाएँ और व्यवस्थाएँ जरूरी हैं, जिनसे किसानों और मेहनतकश उत्पादकों को निष्पक्ष मूल्य और समान अवसर मिल सकें।

Answer by Mrinmoee