Chapter 7
पिता का पत्र पुत्र के नाम
1. गाँधीजी ने पत्र लिखने के लिए अपने पुत्र को ही क्यों चुना?
उत्तर:गाँधीजी ने बताया कि उनके सामने मिस्टर रीच, मिस्टर पोलक और अपने पुत्र को पत्र लिखने के विकल्प थे, परंतु उन्होंने पुत्र को इसलिए चुना क्योंकि पढ़ते समय उनका ध्यान बार-बार पुत्र पर ही जाता था। इससे स्पष्ट होता है कि पुत्र के प्रति उनका गहरा स्नेह और चिंता थी तथा वे उसे जीवन के महत्वपूर्ण मूल्य सिखाना चाहते थे।
2. गाँधीजी ने अपने स्वास्थ्य के विषय में पुत्र को क्या आश्वासन दिया?
उत्तर:गाँधीजी ने अपने पुत्र को आश्वस्त किया कि वह पूर्ण रूप से शांत हैं और उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विशेष कुछ बताने का अधिकार उन्हें नहीं है, फिर भी वे मानसिक रूप से स्वस्थ और संतुलित हैं।
3. गाँधीजी को ‘बा’ के स्वास्थ्य की जानकारी कैसे मिली?
उत्तर:गाँधीजी को ‘बा’ के स्वास्थ्य की जानकारी उनके पत्रों के माध्यम से नहीं, बल्कि डिप्टी गवर्नर की उदारता से मिली। इससे पता चलता है कि जेल में रहते हुए भी उन्हें परिवार की स्थिति की चिंता थी और छोटे-से समाचार से भी उन्हें संतोष मिलता था।
4. गाँधीजी सच्ची शिक्षा किसे मानते हैं?
उत्तर:गाँधीजी के अनुसार केवल अक्षर-ज्ञान ही शिक्षा नहीं है। सच्ची शिक्षा वह है जो चरित्र-निर्माण करे और कर्तव्य का बोध कराए। उनका मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को नैतिक, जिम्मेदार और समाजोपयोगी बनाना है।
5. पुत्र द्वारा माँ की सेवा को गाँधीजी शिक्षा से कैसे जोड़ते हैं?
उत्तर:गाँधीजी मानते हैं कि बीमार माँ की सेवा करना और छोटे भाइयों की देखभाल करना शिक्षा का ही एक महत्वपूर्ण भाग है। यदि यह कार्य आनंद और निष्ठा से किया जाए, तो इससे व्यक्ति की आधी शिक्षा स्वतः पूर्ण हो जाती है।
6. उपनिषदों की किस बात का गाँधीजी पर गहरा प्रभाव पड़ा?
उत्तर:उपनिषदों की टीका में लिखी यह बात कि ब्रह्मचर्य आश्रम संन्यास आश्रम के समान है, गाँधीजी पर गहरा प्रभाव डालती है। इससे उन्हें यह प्रेरणा मिली कि संयम, कर्तव्य और आत्मनियंत्रण जीवन की नींव हैं।
7. गाँधीजी के अनुसार बच्चों में जिम्मेदारी का बोध कब होना चाहिए?
उत्तर:गाँधीजी के अनुसार बारह वर्ष की आयु के बाद बच्चों में जिम्मेदारी और कर्तव्य का बोध होना चाहिए। इस आयु के बाद आमोद-प्रमोद की बजाय अनुशासन और नैतिक जीवन पर बल देना आवश्यक है।
8. सत्य और अहिंसा को अपनाने के बारे में गाँधीजी क्या कहते हैं?
उत्तर:गाँधीजी कहते हैं कि बच्चों को अपने आचार और विचार में सत्य और अहिंसा के प्रयोग का अभ्यास करना चाहिए। यह अभ्यास बोझ की तरह नहीं, बल्कि आनंदपूर्वक और स्वाभाविक होना चाहिए।
9. गाँधीजी अपने बचपन का कौन-सा अनुभव साझा करते हैं?
उत्तर:गाँधीजी बताते हैं कि बचपन में उन्हें अपने पिता की सेवा करने में बहुत आनंद मिलता था। बारह वर्ष की आयु के बाद उन्हें आमोद-प्रमोद के बहुत कम अवसर मिले, फिर भी उन्होंने इसे अपने जीवन का मूल्यवान अनुभव माना।
10. गाँधीजी के अनुसार जीवन की तीन महत्वपूर्ण बातें कौन-सी हैं?
उत्तर:गाँधीजी के अनुसार जीवन की तीन महत्वपूर्ण बातें हैं—अपनी आत्मा का सच्चा ज्ञान, अपने आप का सही परिचय और ईश्वर का सच्चा ज्ञान। इन्हें प्राप्त कर व्यक्ति संसार के किसी भी कोने में अपना निर्वाह कर सकता है।
11. अक्षर-ज्ञान को गाँधीजी किस दृष्टि से देखते हैं?
उत्तर:गाँधीजी अक्षर-ज्ञान को आवश्यक मानते हैं, परंतु उसे अंतिम लक्ष्य नहीं मानते। उनका कहना है कि अक्षर-ज्ञान इसलिए होना चाहिए ताकि जो ज्ञान मिले, उसे दूसरों के हित में प्रयोग किया जा सके।
12. गरीबी के विषय में गाँधीजी का क्या दृष्टिकोण है?
उत्तर:गाँधीजी मानते हैं कि गरीबी में भी सुख संभव है, बल्कि कई बार गरीबी अमीरी से अधिक सुखद होती है। उनका विश्वास है कि सादगी और आत्मनिर्भरता से जीवन अधिक संतोषजनक बनता है।
13. गाँधीजी पुत्र को किसान बनने की सलाह क्यों देते हैं?
उत्तर:गाँधीजी चाहते हैं कि उनका पुत्र एक योग्य किसान बने क्योंकि खेती आत्मनिर्भरता, श्रम और प्रकृति से जुड़ाव सिखाती है। वे मानते हैं कि भविष्य में परिवार का जीवन-निर्वाह खेती से ही होना चाहिए।
14. खेती के कार्य में गाँधीजी किस अनुशासन पर बल देते हैं?
उत्तर:गाँधीजी सभी औजारों को साफ और सुव्यवस्थित रखने की सलाह देते हैं। इससे श्रम के प्रति सम्मान, अनुशासन और कार्यकुशलता विकसित होती है।
15. गणित और संस्कृत पर विशेष ध्यान देने की सलाह क्यों दी गई है?
उत्तर:गाँधीजी का मानना है कि गणित और संस्कृत ऐसे विषय हैं जिन्हें छोटी उम्र में सीखना आसान होता है। भविष्य में संस्कृत विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
16. संगीत के विषय में गाँधीजी क्या कहते हैं?
उत्तर:गाँधीजी संगीत में निरंतर रुचि बनाए रखने की सलाह देते हैं। उनके अनुसार संगीत मन को शांति देता है और जीवन को संतुलित बनाता है।
17. भजनों और कविताओं का संग्रह बनाने की सलाह का उद्देश्य क्या है?
उत्तर:गाँधीजी चाहते हैं कि पुत्र हिन्दी, गुजराती और अंग्रेजी के चुने हुए भजनों और कविताओं का संग्रह बनाए। इससे उसका साहित्यिक स्वाद विकसित होगा और समय के साथ यह संग्रह मूल्यवान सिद्ध होगा।
18. अधिक काम होने पर मनुष्य को क्या नहीं करना चाहिए?
उत्तर:गाँधीजी कहते हैं कि अधिक काम होने पर मनुष्य को घबराना नहीं चाहिए। शांतचित्त होकर क्रमबद्ध ढंग से काम करना चाहिए।
19. सद्गुणों के अभ्यास को गाँधीजी कैसे देखते हैं?
उत्तर:गाँधीजी मानते हैं कि यदि मनुष्य सभी सद्गुणों को प्राप्त करने की चेष्टा करे, तो वे जीवन में अत्यंत उपयोगी और मूल्यवान सिद्ध होते हैं।
20. खर्च के विषय में गाँधीजी कौन-सी आदत की अपेक्षा रखते हैं?
उत्तर:गाँधीजी चाहते हैं कि पुत्र घर के हर खर्च का पैसा-पैसा हिसाब रखे। इससे ईमानदारी, जिम्मेदारी और संयम की आदत विकसित होती है।
21. प्रार्थना को गाँधीजी जीवन में क्यों महत्वपूर्ण मानते हैं?
उत्तर:गाँधीजी प्रार्थना को आत्मिक शांति और अनुशासन का साधन मानते हैं। नियमित प्रार्थना जीवन में स्थिरता और नैतिक बल प्रदान करती है।
22. प्रार्थना के समय के विषय में गाँधीजी क्या कहते हैं?
उत्तर:गाँधीजी सूर्योदय से पहले उठकर प्रार्थना करने को बहुत अच्छा मानते हैं और एक निश्चित समय पर नियमित रूप से प्रार्थना करने पर जोर देते हैं।
23. रविवार की प्रार्थना के विषय में क्या निर्देश दिए गए हैं?
उत्तर:गाँधीजी आशा करते हैं कि उनका पुत्र रविवार को श्री वेस्ट के यहाँ प्रार्थना में अवश्य जाता होगा, जिससे सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन मजबूत बने।
24. नियमितता को गाँधीजी किस रूप में देखते हैं?
उत्तर:गाँधीजी के अनुसार नियमितता जीवन में आगे चलकर बहुत सहायक सिद्ध होती है। यह अनुशासन और आत्मनियंत्रण को बढ़ाती है।
25. पत्र का उत्तर लिखने के बारे में गाँधीजी क्या कहते हैं?
उत्तर:गाँधीजी कहते हैं कि पत्र को अच्छी तरह समझकर उत्तर लिखा जाए और उत्तर जितना लंबा चाहें, उतना लिखा जा सकता है।
26. पत्र में पिता-पुत्र संबंध कैसे प्रकट होता है?
उत्तर:पत्र में स्नेह, मार्गदर्शन और विश्वास झलकता है। गाँधीजी पिता के रूप में पुत्र को जीवन-मूल्य सिखाते हुए उसका मनोबल बढ़ाते हैं।
27. गाँधीजी का शिक्षा-दर्शन क्या है?
उत्तर:गाँधीजी का शिक्षा-दर्शन नैतिकता, सेवा, आत्मनिर्भरता और चरित्र-निर्माण पर आधारित है, न कि केवल पुस्तकीय ज्ञान पर।
28. सेवा को गाँधीजी क्यों महत्वपूर्ण मानते हैं?
उत्तर:सेवा से त्याग, करुणा और जिम्मेदारी का विकास होता है। गाँधीजी इसे सच्ची शिक्षा का आधार मानते हैं।
29. गरीबी को लेकर गाँधीजी का जीवन-दर्शन क्या है?
उत्तर:गाँधीजी सादगीपूर्ण जीवन को श्रेष्ठ मानते हैं और मानते हैं कि गरीबी में भी आत्मिक सुख प्राप्त किया जा सकता है।
30. पत्र में आत्मनिर्भरता का विचार कैसे प्रकट होता है?
उत्तर:खेती, श्रम और अनुशासन की सलाह देकर गाँधीजी आत्मनिर्भर जीवन की प्रेरणा देते हैं।
31. गाँधीजी के अनुसार शिक्षा का अंतिम उद्देश्य क्या है?
उत्तर:शिक्षा का अंतिम उद्देश्य दूसरों के काम आना और समाज की सेवा करना है।
32. गाँधीजी संस्कारों को क्यों आवश्यक मानते हैं?
उत्तर:संस्कार व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करते हैं और उसे नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।
33. पत्र में अनुशासन का महत्व कैसे दिखाया गया है?
उत्तर:नियमित प्रार्थना, खर्च का हिसाब और समयबद्ध जीवन अनुशासन के उदाहरण हैं।
34. गाँधीजी का आदर्श विद्यार्थी कैसा होना चाहिए?
उत्तर:आदर्श विद्यार्थी कर्तव्यनिष्ठ, सेवा-भावी, अनुशासित और नैतिक होना चाहिए।
35. पत्र में पारिवारिक मूल्यों की झलक कैसे मिलती है?
उत्तर:माँ की सेवा, भाइयों की देखभाल और परिवार की जिम्मेदारी से पारिवारिक मूल्य प्रकट होते हैं।
36. गाँधीजी के विचारों में धर्म का क्या स्थान है?
उत्तर:धर्म उनके लिए प्रार्थना, सत्य और अहिंसा के रूप में जीवन से जुड़ा हुआ है।
37. पत्र में सरल जीवन का संदेश कैसे दिया गया है?
उत्तर:गरीबी, खेती और सादगी की बात कर सरल जीवन का संदेश दिया गया है।
38. गाँधीजी का यह पत्र किस प्रकार प्रेरणादायक है?
उत्तर:यह पत्र नैतिक जीवन, सेवा और आत्मनिर्भरता की प्रेरणा देता है।
39. पत्र में गाँधीजी का व्यक्तित्व कैसे उभरता है?
उत्तर:गाँधीजी एक स्नेही पिता, विचारशील गुरु और आदर्श मानव के रूप में उभरते हैं।
40. इस पत्र से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर:इस पत्र से हमें कर्तव्य, सेवा, सादगी, सत्य, अहिंसा और अनुशासनपूर्ण जीवन जीने की शिक्षा मिलती है।
Answer by Mrinmoee