Lesson- 8

 रस 

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1. रस की परिभाषा क्या है? रस के प्रमुख अंगों के नाम लिखो

उत्तर:  काव्य या नाटक को पढ़ने, अभिनय देखने से या सुनने से हमारे सहृदय में जो आनंद प्राप्त होता है उसे रस कहांँ जाता है।

        आचार्य भरत मुनि को रस सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है। उन्होंने रस की परिभाषा कुछ इस प्रकार दी है-

"विभानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्ति:।"

       अर्थात विभाग, अनुभाग और संचारीभाव जब स्थायीभाव के साथ मिल जाता है तब रस की निष्पत्ति होती है।

        रस के प्रमुख चार अंग होते हैं:-

(क) स्थायीभाव, (ख) विभाव,

(ग) अनुभव, (घ) व्यभिचारी या संचारीभाव।

2. स्थायीभाव किसे कहते हैं?  स्थायीभाव कितने प्रकार के होते हैं और वे क्या-क्या है?

उत्तर: स्थायीभाव सहृदय के अंतःकरण में मनोविज्ञान, वासना, व संस्कार रूप में सदा विद्यमान रहता है। जिन्हें अन्य कोई भी विरोधी या अविरोधी भाव दबा नहीं सकता, उसे स्थायीभाव कहते हैं। साधारण अर्थ में हमेशा बने रहने वाले भाव को स्थायीभाव कहते हैं।

      स्थायीभाव ग्यारह  प्रकार के होते हैं:- रति, हास, शोक,  क्रोध,  भय,  जुगुप्सा, विस्मय, निर्वेद, वात्सल्य और ईश्वर विषयक प्रेम।

3. विभाव किसे कहते हैं?

उत्तर: विभाव का अर्थ है कारण। सहृदय में स्थित स्थायी भाव को उद्बोधिन करने वाले कारण ही विभाव है। अर्थात स्थायी भावों को जाग्रत करने के कारण इन्हें विभाव कहा जाता है। इसे दो भागों में बांँटा गया है- (क) आलंबन विभाव और (ख) उद्दीपन विभाव

(क) आलम्बन विभाव: काव्य नाटक आदि में वर्णित जिन पात्रों का अवलम्बन करके स्थायी भाव को जलाया जाता है उसे आलम्बन विभाव कहा जाता है। आलम्बन विभाव के भी के दो भेद है-

i. विषय- जिसके प्रति भाव जाग्रत हो।

ii. आश्रय- जिसमें भाव जाग्रत हो।

(ख) उद्दीपन विभाव: स्थायी भाव को जाग्रत रखने में सहायक भूत कारण ही उद्दीपन विभाग कहलाते हैं। अर्थात आलम्बन विभाग के द्वारा जाग्रत स्थायी भाव जो उद्दीपन की स्थिति उत्पन्न करते हैं, उसे उद्दीपन विभाव कहा जाता हैै।

4. अनुभाव किसे कहते हैं? इसे कितने भागों में बांँटा गया है?

उत्तर: रति, लोक, हास आदि स्थायी भावों को प्रकाशित या व्यक्त करने वाली आश्रय की चेष्टाएँ अनुभाव कहलाती है। अनुभाव को चार भागों में बांँटा गया है-

(क) आंगिक: आश्रय की शरीर सम्बंधी चेष्टाएंँ आंगिक या कायिक अनुभाव कहलाती है। जैसे- हठ करना, हंँसना आदि।

(ख) वाचिक:  वचनों द्वारा हृदय के भावों को जाग्रत करना ही वाचिक अनुभव कहलाता है। जैसे बातें करना।

(ग) आहार्य:  आरोपित या कृतिम वेश- रचना को आहार्य अनुभाव कहा जाता है। जैसे- मन में किसी भाव को वास्तविक रूप देना।

(घ) सात्विक: स्थायी भाव के जाग्रत होने पर स्वाभाविक, अकृत्रिम अंग विकार को सात्विक अनुभाव कहते हैं।

5. संचारी भाव किसे कहते हैं?

उत्तर: वे भाव जिसका कोई स्थाई कार्य नहीं होता वह संसारी भाव कहलाता है। इसे व्यभिचारी भाव भी कहा जाता है। ऐसे भाव जो स्थाई भाव को पुष्ट करके विलीन हो जाता है उसे संचारी भाव कहते हैं। काव्यशास्त्र में संचारी भावों की कुल संख्या 33 मानी गई है। जैसे- निर्वेद, ग्लानि, शंका, मद, चिंता, मोह, गर्व, विषाद, विरोध आदि आदि।

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Reetesh Das

(M.A in Hindi)

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